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Saturday, July 16, 2022

34 द‍िन में 8540 KM का बाइक से अकेले सफर, पूर्वोत्‍तर को जानने का म‍िला अवसर  

नई द‍िल्‍ली: 6 सालों में 25 हजार क‍िलोमीटर का सफर तय करके भारत के अनछुए पहलुओं को लोगों के सामने लेकर आने के बाद सातवीं ट्र‍िप में कुछ बड़ा ही धमाका हुआ. 100 सीसी की टीवीएस स्‍पोर्टस बाइक से सातवीं बार में 8540 क‍िमी का सफर तय कर डाला, वह भी मात्र 34 द‍िन में. चूंक‍ि इतने द‍िन की छुट्टी क‍िसी भी संस्‍थान में म‍िलना मुश्‍क‍िल थी, इसल‍िए मीड‍िया की नौकरी को भी कुछ समय के ल‍िए बाय-बाय कहना पड़ा. 

नगालैंंड की जमीन पर भोपाल से गई बाइक.  

बाइक से सातवीं यात्रा पूर्वोत्‍तर भारत की थी जो 7 अप्रैल 2022 को भोपाल से शुरू हुई थी और 10 मई को भोपाल में ही खत्‍म हुई थी. इस दौरान भारत के 14 राज्‍यों और देश की राजधानी द‍िल्‍ली से गुजरना हुआ. 

मेघालय के चेरापूंंजी में बादलों के बीच से गुजरने का अनुभव. 

इस यात्रा का न‍िर्णय भी अचानक हुआ था. स‍िर्फ एक द‍िन पहले ही प्‍लान हुआ था क‍ि नॉर्थ ईस्‍ट की यात्रा करनी है. इस यात्रा को करते ही भारत के सभी 28 राज्‍यों को कवर करने का सपना पूरा होने वाला था. 10 साल पुरानी 100 सीसी बाइक से पूर्वोत्‍तर के पहाड़ों में जाना वाकई में अपने आप में चुनौती थी लेक‍िन उस चुनौती को भी सफलतापूर्वक पूरा क‍िया. इस सफर में कुल 40 हजार रुपये का खर्चा आया, उसमें भी कई लोगों ने आगे बढ़कर मदद की. इस खर्चे में बाइक का पेट्रोल, रहना, खाना, टूर‍िस्‍ट प्‍लेस की ट‍िकट शाम‍िल हैं. 

मेघालय में झरनों के बीच.

अब इसी यात्रा को शब्‍दों में प‍िरोने का काम शुरू हो रहा है. यह यात्रा 34 द‍िनों में हुई तो कोश‍िश है क‍ि इसे 34 ब्‍लॉग में पूरा ल‍िख दें. इस यात्रा में रोमांच तो है ही, साथ ही यात्रा के बाद जो हुआ, वह भी आम इंसान को समझने की जरूरत है.  

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Friday, September 13, 2019

जब आधी रात को छोड़ना पड़ी रुकने की जगह, अनजान रास्तों पर बिना हैडलाइट के 110 की स्पीड पर बाइकिंग

गुजरात के जामनगर से निकलकर हड़प्पा संस्कृति की भारत में सबसे बड़ी साइट धौलावीरा देखने के लिए  मैँ निकला जो कच्छ के रण के बीच में था। रास्ते में एक जगह पेट्रोल और पैसे खत्म हो गए तो किसी तरह उसकी व्यवस्था की। 

रास्ता ही जिंदगी है, जिंदगी ही रास्ता है
जामनगर से सुबह 7 बजे निकलना हुआ। दोपहर 12 बजे जामनगर से 167 किलोमीटर दूर सामख्याली पहुंचा। यहां से धौलावीरा जाने का रास्ते था लेकिन वह मुझे पता नहीं चल पाया था। मैप में भचाऊ से धौलावीरा जाने का रास्ता दिख रहा था जो शार्टकट था इसलिए मैं यहां से आगे निकल लिया। सामख्याली से 17 किलोमीटर आगे भचाऊ था। यहां दैनिक भास्कर के रिपोर्टर से पहले ही बात हो गई थी तो वह मुझे अपने ऑफिस ले गए। यहां आकर पता लगा कि भचाऊ वाला रास्ता तो अब बंद हो गया है। वापस सामख्याली से जाना पड़ेगा या फिर भुज से जाना होगा। 

भचाऊ में दैनिक भास्कर के मित्र
खैर अब आगे तो बढ़ चुके थे इसलिए पीछे लौटने का सवाल ही नहीं था। यहां पर थोड़ा आराम कर साढ़े 3 बजे निकले और  साढ़े 4 बजे गांधीधाम पहुंचे जो भचाऊ से 35 किलोमीटर दूर था। 

गांधीधाम 

गांधीधाम से 13 किलोमीटर दूर कांडला पोर्ट था तो वहां भी चल दिए। रास्ते में दोनों तरफ समुद्री पानी भरा था जिसमें नमक बन रहा था। साथ ही यहां सैकड़ों की संख्या में साइबेरियन प्रवासी सारस पक्षी दिखे जो गुलाबी कलर के थे और बहुत ही खूबसूरत दिखाई दे रहे थे। 

कांडला सी पोर्ट 

कांडला से वापस गांधीधाम आना पड़ा और फिर गांधीधाम से 55 किलोमीटर दूर मुंद्रा पोर्ट पहुंचा। यहां पर अडानी ग्रुप की ऑयल की रिफायनरी हैं। यहां हर तरफ लाल ही लाल रंग नजर आता है। मुंद्रा तक पहुंचते पहुंचते 7 बज चुके थे और अभी भुज काफी दूर था। मुंद्रा से 52 किलोमीटर की दूरी तय कर सवा 8 बजे मांडवी पहुंचा जो एक खूबसूरत बीच था। बीच के किनारे नारियल के पेड़ों की श्रंखला बनी हुई थी। यहां तेज हवा के कारण बहुत सारी पवन चक्कियां भी लगी हुई थीं। यहां का सनसेट बहुत ही खूबसूरत होता है। उस सनसेट के कई फोटो मैंने वहीं एक लोकल बंदे से लिए। 

मांडवी बीच

यहां ऐसा लग रहा था कि बस यहीं रुक जाएं। बाइक में लाइट भी नहीं थी। बाइक की हैडलाइट दो दिन पहले हुए एक्सीडेंट में खराब हो गई और यहां रास्ते में उसे ठीक कराने के पैसे भी नहीं थे। शरीर भी थक गया था लेकिन यहां रुकने से पूरे एक दिन की बर्बादी होनी थी, सो आगे चलना पड़ा। 

इसके बाद शुरू हुई जिंदगी की सबसे खतरनाक राइड। मांडवी से भुज 65 किलोमीटर दूर था और मांडवी में ही सवा 9 बज चुके थे। यह एक अनजान रास्ता था और बाइक में लाइट भी नहीं थी। रास्ते का भी पता नहीं था कि बीच में कोई कस्बा या गांव पड़ेगा या नहीं। अभी इतना सोच ही रहा था कि वहां से एक बस निकली। मैंने सोच को विराम देते हुए उसी बस की बैकलाइट को आधार बनाते हुए राइड शुरू कर दी। 

शुरू में तो बस 70 की स्पीड से चल रही थी तो मैंटेन हो रहा था लेकिन फिर बस ने स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी क्योंकि गुजरात की सड़कें और राज्यों की अपेक्षा उस समय बेहतर थीं। बस की स्पीड 80, 90, 100, 110 तक पहुंची और हमें भी उसी स्पीड से अपनी बाइक भगानी पड़ी। क्योंकि यदि ऐसा नहीं करते तो उस अंधेरे में दूसरे वाहन कब निकलते, पता नहीं और रास्ते में रुक भी नहीं सकते थे। एक समय तो ऐसा आया कि 120 की स्पीड से बस को ही ओवरटेक करना पड़ा। उस समय नई बाइक थी और स्पीड पूरी 140 की खुली हुई थी। यह एक खतरनाक कदम था लेकिन रिस्क लिया। इसका असर यह हुआ कि फिर बस 80 की स्पीड से चलने लगी। उसे भी लगा कि बाइक वाला बस के पीछे इसलिए लगा था कि उसकी रोशनी में वह आगे जा सके। 

खैर 50 मिनट में 65 किलोमीटर की दूरी तय कर सवा 10 बजे भुज आ गए। अब यहां रुकने का ठिकाना ढूंढना था। तभी वहां स्वामीनारायण का मंदिर दिखा तो हमने वहां रुकने की जुगाड़ लगाई। 50 रुपये की पर्ची कटी लेकिन रुकने की जगह थोड़ा अलग जगह थी। अब इतनी रात को कर भी क्या सकते थे। 

भुज
मुझे एक ऐसा कमरा मिला जिसमें पहले से ही दो लोग थे। कमरे में पंखा लगा था और मच्छरों की भरमार थी। एक केयरटेकर था जो आराम से खटिया पर सो रहा था। रात में मोबाइल और कैमरा चार्ज करना था इसलिए अब यहां रुकने के अलावा कोई चारा नहीं था। 

रात को 12 बजे किसी तरह सोने की कोशिश की लेकिन मई की गर्मी और वह भी कच्छ के इलाके में, दम निकाल रही थी। किसी तरह डेढ़ घंटे की नींद ली लेकिन बीच में उठ गया। अब गर्मी और मच्छरों की वजह से सोना नहीं हो पा रहा था। मैं फिर से उस केयरटेकर के पास गया और बोला कि भाई कोई कमरा हो तो दे दो, भले ही 500 रुपये ले लेना लेकिन उसने कहा कि सोना है तो सोओ, नहीं तो जाओ। पता नहीं, क्यों मुझे उसकी बात चुभ गई। ऊपर गया और बैग पैक कर लिया। 10 मिनट में बैग पैक किया और नीचे आ गया। 

अब एक अनजान शहर में रात को बाइक से चलना था, वह भी बिना हैडलाइट की बाइक से। दो दिन पहले ही एक्सीडेंट हुआ था जिसमें हाथ और पैरों में चोट थी लेकिन जुनून सब करवा देता है। थोड़ी देर मैं एक दुकान पर बैठा और पोहा खाकर चाय पी। इस रास्ते पर अच्छी बात यह थी कि यह हाइवे था और पूरे रास्ते में स्ट्रीट लाइट लगी थीं इसलिए ज्यादा चिंता की बात नहीं थी। 

यहां से रात 2 बजे चलना शुरू किया लेकिन आधा घंटे बाद ही नींद आने लगी। तभी वहां रास्ते में एक चाय की दुकान दिखी। वहां एक खटिया भी बिछी थी। चाय वाले की दुकान पर एक बच्चा बैठा था। उससे बातों ही बातों में पता लगा कि यह वह जगह थी जहां भूकंप के बाद सोनिया गांधी आईं थी। यह एक मुस्लिम बहुल बस्ती थी। चाय पीकर मैं वहीं खटिया पर सो गया। सुबह 4 बजे वहां लोगों का आना-जाना शुरू हुआ तो मुझे भी वहां से चलना पड़ा। फिर थोड़ा आगे बढ़ा, तब तक सुबह हो चुकी थी।

लगातार 24 घंटे में 500 किलोमीटर के सफर के बाद यह हालत हो गई थी।
फिर एक चाय की दुकान पर रुका और चाय पीकर वहीं एक पटिया पर सो गया। गहरी नींद की वजह से कुछ अहसास ही नहीं हो रहा था। फिर सुबह पौने सात बजे उठे और मुंह-हाथ धोकर आगे के सफर पर चल दिए।

इस चाय की दुकान पर पटिया पर सोकर बिताई रात।
यह रोमांचक और खतरनाक सफर 7 और 8 मई 2013 का है जब भोपाल से गुजरात की 3433 किमी की पहली बाइक यात्रा पर अकेले निकला था। 

अगली सच्ची कहानी में रोमांच महसूस होगा भारत की सबसे बड़ी हड़प्पा साइट धौलावीरा और कच्छ के रण का... 

Friday, September 21, 2018

भिखारी पॉलिटिक्स का गजबिया ज्ञान #4 #Amazingindia

अभी हाल में बहुजन समाज पार्टी की लीडर मायावती  ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को धता बनाकर पूर्व कांग्रेसी लीडर अजीत जोगी की जनता कांग्रेस से गठबंधन कर लिया है। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि एक राष्ट्रीय पार्टी जब बीएसपी के दरवाजे पर दस्तक दे रही हो तब एक अनाम से क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन कुछ हजम नहीं होता, लेकिन ऐसा हुआ।

हाल ही में 6 राज्यों में 4500 किमी बाइक से छत्तीसगढ़ के दूर-दराज के क्षेत्रों में घूमकर जाना कि छत्तीसगढ़, कैसे दूसरे राज्यों से अलग है, वहां जमीनी स्तर पर लोग कैसे रहते हैं, इन सब सवालों के जवाब एक भिखारी के माध्यम से आर्टिकल में देने की कोशिश की गई है...


13 अगस्त 2018 शाम 6 से रात 7 बजे तक...छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाने वाला कवर्धा जिले में भोरमदेव टेंपल का रास्ता

भोपाल से 12 अगस्त को बाइक से निकला और 13 अगस्त की शाम को भोरमदेव टेंपल पहुंचा। भोरमदेव के मंदिर के चारों तरफ खजुराहो जैसी ही कामुक प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गईं हैं। यहां उस समय सावन का मेला चल रहा था। मंदिर को देखने के बाद जब रायपुर के लिए निकला तो अंधा भिखारी लिफ्ट लेने के लिए खड़ा था। मैं तो वैसे भी रास्ते में लिफ्ट देकर ही चलता हूं जिससे की लोकल के लोगों से बातचीत होती रहे। उसके साथ बेटी भी थी जो उसे रास्ता दिखाती थी। वह दोनों बाइक पर बैठ गए और शुरू हुई बातचीत..


इस भिखारी की बातें सुनकर पॉलिटिक्स के धुरंधरों की आखें खुल जाएंगी।
-कहां चलना है?
भिखारी-आगे 15 किमी की दूरी पर मेरा घर है, मुझे वहां तक छोड़ृ दें। मंदिर के प्रसाद के 8 किलो चावल मिले थे, उन्हें मैंने किसी और के हाथों घर भेज दिया है।
-यहां क्या रोज आते हो?
भिखारी-नहीं,बस सावन के महीने में 8 दिन मेला लगता है, उसी समय भीख के लिए आता हूं। यहां चावल चढ़ाया जाता है, उसी से काम चल जाता है?
-बाकी समय?
भिखारी-बाकी समय कुछ नहीं, बस घर पर पड़े रहते हैं।
-फिर घर कैसे चलता है?
भिखारी-रमन सिंह हर महीने चावल, कैरोसीन दे देता है। उससे घर चल जाता है।
-बाकी की जरूरतें कैसे पूरी होती हैं?
भिखारी-जब कुछ जरूरत होती है तो उनके घर चला जाता हूं। उनके बेटे अभिषेक से बात करता हूं तो कुछ मदद मिल जाती है।
-बच्चों की पढ़ाई?
भिखारी-स्कूल से ही कॉपी-किताब, ड्रेस मिलती हैं। स्कॉलरशिप भी मिलती है तो इससे काम चल जाता है। अब तो बस आवास चाहिए, उसका भी वादा किया हुआ है। अभी चुनाव आने वाले हैं, उनके घर जाकर फिर मिलता हूं। उनसे कहूंगा कि आवास दे दो तो इस बार भी तुम ही जीतोगे।
-अगर आवास नहीं दिया तो?
भिखारी-तो फिर कैसे जीतेगा, हमारे आशीर्वाद से ही तो उसे जीत मिलती है, हार नहीं जाएगा।
-वह तुम्हें आवास क्यों देगा?
भिखारी- क्योंकि उसका काम है देना।
-और तुम्हारा?
भिखारी-(इस बार जवाब देने से पहले वह कुछ देर रुका फिर बोला) हमारा काम है लेना....



(6 सालों में 23,500 किमी की दूरी तय कर 20 राज्यों में मोटरसाइकिल से भारत भ्रमण करने के बाद 'Amazingindia' सीरिज के तहत ये ऑरिजनल कंटेंट है। इसका किसी भी तरह से उपयोग करने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत कार्रवाई करने का सर्वाधिकार सुरक्षित)  

Saturday, September 15, 2018

आखिर क्यों नहीं पहनतीं यहां महिलाएं ब्लॉउज #3 #Amazingindia

भोपाल. 22 सितंबर को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओडिशा में एयरपोर्ट, रेल लाइन और माइनिंग से रिलेटेड इश्यूज के लिए ओडिशा जाने वाले हैं। ये एक ऐसा राज्य है जहां एक तरफ आधुनिकता के दर्शन होते हैं तो वहीं गरीबी के लिए भी ये दुनिया में बदनाम है। आखिर क्या है ओडिशा का सच? 
 

ओडिशा में चिल्का क्षेत्र की महिला बिना ब्लॉउज के सिर्फ साड़ी में ही। 
हाल ही में 6 राज्यों में 4500 किमी बाइक से ओडिशा के दूर-दराज के क्षेत्रों में घूमकर जाना कि ओडिशा, कैसे दूसरे राज्यों से अलग है, वहां जमीनी स्तर पर लोग कैसे रहते हैं, उनके लिए विदेश क्या है? आखिर वहां कई इलाकों की महिलाएं ब्लॉउज क्यों नहीं पहनतीं? इन सब सवालों के जवाब इस आर्टिकल में देने की कोशिश की गई है...

14 अगस्त 2018 रात 7 बजकर 50 मिनट से 17 अगस्त रात 9 बजे तक...ओडिशा में 1000 किमी की बाइक राइडिंग...यहां असका से हुम्मा के बीच की स्टोरी...हुम्मा से सिर्फ 6 किमी दूर ही पदमपेट में वर्ल्ड फेमस ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं का प्रजनन स्थल है

ओडिशा में पदमपुर कस्बे में प्रवेश करने के बाद एक चीज मुझे बार-बार चौंका रही थी। बरसात में यहां धान की खेती में महिलाएं काम कर रही थी लेकिन अपने शरीर को सिर्फ साड़ी से ही ढकें हुई थीं। पहले मैंने सोचा कि शायद ये कोई प्रथा होगी और कुछ विशेष इलाकों और बड़ी उम्र की महिलओं में ही ऐसा होता होगा लेकिन यहां तो ऐसा कुछ नहीं था। सभी उम्र की महिलाएं कई इलाकों में बिना ब्लॉउज के ही दिखीं।
असका से हुम्मा के बीच केे खेत। ओडिशा में मध्यप्रदेश से मेरी बाइक।

इस वजह से नहीं पहन पाती महिलाएं ब्लॉउज
असका से हुम्मा जाने के बीच एक जगह महिलाएं खेतों में काम कर रही थीं तो वहीं सड़क से गुजरते एक शख्स से आखिर पूछ ही लिया कि यहां ऐसा क्यों हैं? तब उसने जवाब दिया कि ये कोई प्रथा के कारण नहीं हैं। यहां गरीबी का बोल-बाला है। ये सभी महिलाएं सुबह 6 बजे से आईं है और दोपहर 12 बजे तक काम करेंगीं तब उन्हें 120 रुपए दिए जाएंगें। यदि पूरे दिन काम करेंगी तो 240 रुपए। साल के सिर्फ 2 महीने ही धान की खेती के समय इन्हें काम मिलता है, बाकी समय यहां कोई फसल नहीं होती। इसी पैसे से गुजारा करना पड़ता है। सदियों से ऐसा ही चल रहा है। अब जब पैसे ही नहीं होंगे तो वह कैसे कपड़ों पर खर्च करेंगी। यही कारण है कि एक साड़ी में ये पूरा जीवन गुजार देती हैं। बाकी के समय इन्हें 'विदेश' जाकर काम करना होता है? जब उनसे पूछा कि विदेश मतलब क्या तो उसने जवाब दिया कि आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र में जाकर काम करने को ही यहां विदेश माना जाता है।
साल में सिर्फ 2 महीने काम, मजदूरी सिर्फ 120 रुपए 
(6 सालों में 23,500 किमी की दूरी तय कर 20 राज्यों में मोटरसाइकिल से भारत भ्रमण करने के बाद 'Amazingindia' सीरिज के तहत ये ऑरिजनल कंटेंट है। इसका किसी भी तरह से उपयोग करने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत कार्रवाई करने का सर्वाधिकार सुरक्षित)  


Thursday, September 6, 2018

अतीत के बंगाल का कैसा है 'वर्तमान', सियासत का बदलता चेहरा

भोपाल. देश में भीमा-कोरगांव हिंसा मामले में वामपंथी विचारधारा के पांच एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी सुर्खियों में है। वामपंथ का उदय और स्वर्णिमकाल पश्चिम बंगाल को माना जाता है। यहीं से फैली वाम विचारधारा इतनी शक्तिशाली थी कि पश्चिम बंगाल में 35 सालों से ज्यादा टिकी रही और केंद्र में कौन प्रधानमंत्री बनेगा, उसका निर्णय भी करती थी। लेकिन क्या आज भी बंगाल ऐसा ही है? क्या वहां वामपंथ आज भी मजबूत स्थिति में है? कैसा है पश्चिम बंगाल का 'वर्तमान'?...


पश्चिम बंगाल में नंदकुमार शहर के पास का कस्बा, जहां ट्रैफिक चाैराहे पर सीएम ममता बनर्जी की तस्वीर नजर आ रही है।
हाल ही में 6 राज्यों में 4500 किमी बाइक से बंगाल के दूर-दराज के क्षेत्रों में घूमकर जाना कि बंगाल, कैसे दूसरे राज्यों से अलग है, वहां जमीनी स्तर पर लोग क्या सोचते हैं, राजनीति के प्रति उनका नजरिया क्या है, ओवरऑल बंगाल के कैसे अनुभव हुए और वहां की राजनीति का हमसे कैसा सरोकार है?

#Amazingindia सीरिज के पहले आर्टिकल में पश्चिम बंगाल की कानून व्यवस्था पर रोशनी डाली थी, इस आर्टिकल में राजनीतिक व्यवस्था को महसूस करने की कोशिश की गई है।

17 अगस्त की रात से 19 अगस्त 2018 सुबह 10 बजे तक...ओडिशा-पश्चिम बंगाल बॉर्डर दीघा से कोलकाता होते हुए सिंगूर, वर्धमान, दुर्गापुर, आसनसोल, चितरंजन झारखंड बॉर्डर तक 430 किमी मोटरसाइकिल से यात्रा...

दीघा में कानून व्यवस्था की सख्ती की बात तो समझ में आ गई थी। अब वहां घूमते हुए एक चलती-फिरती पनवाड़ी की दुकान दिखाई जहां एक अधेड़ शख्स न्यूजपेपर पढ़ रहा था। जब उनसे न्यूजपेपर का नाम पूछा गया तो बताया बंगाली का 'वर्तमान'। एक समय आनंद बाजार पत्रिका की पूरे बंगाल में धूम थी लेकिन उसकी जगह अब 'वर्तमान' और 'प्रतिदिन' जैसे न्यूज पेपर ने ले ली थी।



पोस्टर वूमेन नजर आईं ममता बनर्जी
दीघा से निकलकर अब ग्रामीण इलाकों से होते हुए कोलकाता पहुंचना था। मुझे ये महसूस करना था कि देश में जिस वामपंथ की धूम है, उसकी अपने राज्य में क्या स्थिति है? पूरे 400 किमी के रास्ते में एक भी वामपंथ या उनकी पार्टी से संबंधित बैनर-पोस्टर या दीवार पर स्लोगन नजर नहीं आया। इन पूरे रास्तों पर एक ही चेहरा नजर आया जो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का था। राज्य की सड़कों पर ट्रैफिक फॉलो करने के स्लोगन थे लेकिन उनपर अनिवार्य रूप से बना था ममता का चेहरा। हाइवे के पुल से झांककर जब नीचे के शहरों को देखा तो वहां सिर्फ एक ही पोस्टर नजर आया जिसमें ममता बनर्जी कुछ कह रही थीं। बीच-बीच में कुछ ग्रामीण जगहों पर भाजपा के पोस्टर तो नजर आ गए थे लेकिन वामपंथ गायब था।
पश्चिम बंगाल में रानीगंज, यहां भी राजनीतिक पोस्टर सिर्फ सीएम ममता बनर्जी के दिखे।
कातर आंखों ने दिया सियासत के हाल का जवाब
इस चीज को नोटिस करते ही मैं एक जगह खाना खाने रूका तो सामने बैठे शख्स से कोलकाता के बारे में जानकारी लेना शुरू की। वह कोलकाता में रहता था। उसने वहां के नियम-कायदे कानून की जानकारी देना शुरू की। बाइक चलाते समय पैरों में जूते होने चाहिए। ड्राइविंग लाइसेंस, इंश्योरेंस, गाड़ी के पेपर, पॉल्यूशन कंट्रोल यूनिट की एनओसी कंपल्सरी है नहीं तो केस बनेगा। यहां की पुलिस तो केस बनाने के बहाने ढूंढ़ती है। मैंने उससे धीरे से पूछ ही लिया कि भाई ये तो वामपंथ का गढ़ है लेकिन यहां तो उसका वजूद तक दिखाई नहीं दे रहा। उसने कातर आंखों से मेरी आंखो में देखा और धीरे से कहा - तभी तो ये हालत है और फिर चुप हो गया।

कोलकाता में घुसने से पहले एक ढाबे पर खाना खाया तो बंगाल की जानकारी स्थानीय लोगों से ली।
चेहरे के पीछे जनता एकजुट
बंगाल घूमने के बाद एक चीज तो तय हो गई कि वहां चेहरा बिकता है, वह चाहें ज्योति बसु का हो, बुद्धदेव भट्टाचार्य का हो या ममता बनर्जी का। जनता चेहरे के पीछे एकजुट होकर खड़ी होती है और विरोधियों का समूल नाश कर देती है जो पहले कभी अपने थे।

इसलिए और ऐसे बदला बंगाल
मुझे लगा कि बंगाल के बारे में जो दिख रहा है और समझ में आ रहा है, ये कहीं भ्रम तो नहीं तो फिर मप्र में वामपंथ का झंडा पीढ़ी दर पीढ़ी उठाने वाले एक शख्स से बात की जिसने पुराना बंगाल और वर्तमान का बंगाल देखा था। उसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बंगाल से वामपंथ का वजूद मिट चुका है। जो कैडर्स कभी पार्टी की जान हुआ करते थे, उनकी हत्याएं हो चुकी हैं। वामपंथी पार्टी का ऑफिस कार्यालय भी जेल जैसा लगता है। टीएमसी और भाजपा के गठबंधन ने वामपंथ को मिटाने में कसर नहीं छोड़ी है। यही कारण है कि बंगाल में बीजेपी के पोस्टर तो कहीं-कहीं नजर आ जाते हैं लेकिन वामपंथ के नहीं। युवा बीजेपी की तरफ आकर्षित है और मुस्लिम और गरीब तबका टीएमसी की तरफ। अब तो वामपंथ दिल्ली और हिंदी बेल्ट की राजधानियों में बैठकर ही सुरक्षित बचा है।
अतीत और वर्तमान का कोलकाता, पश्चिम बंगाल की राजधानी।
(6 सालों में 23,500 किमी की दूरी तय कर 20 राज्यों में मोटरसाइकिल से भारत भ्रमण करने के बाद 'Amazingindia' सीरिज के तहत ये ऑरिजनल कंटेंट है। इसका किसी भी तरह से उपयोग करने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत कार्रवाई करने का सर्वाधिकार सुरक्षित)  

Friday, November 11, 2016

Solo #Biking: रहस्यमय नजर आया मिट्टी का टीला, 5 हजार साल पुरानी बस्ती है यहां दफन

                      केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की बाइक से 3850 किलोमीटर की अकेले रोमांचक यात्रा


                                         PART-15 भिवानी से अजमेर तक का सफर


11 नवंबर, भोपाल। भोपाल से 30 मई को यात्रा पर निकलने के बाद 30 की रात को ही 231 किमी की दूरी तय कर चंदेरी पहुंचा। उसके बाद दूसरे दिन 31 मई को 371 किमी की दूरी तय कर आगरा पहुंचा। 1 जून को आगरा से हस्तिनापुर 319 किमी की दूरी तय कर पहुंचा। 2 जून को 305 किमी की यात्रा कर हस्तिनापुर से रुद्रप्रयाग पहुंचा। 

3 जून को रुद्रप्रयाग से चला और 77 किमी दूर गौरीकुंड पहुंचा। यहां से केदारनाथ मंदिर की 16 किमी की चढ़ाई शुरू की। 3 जून की शाम केदारनाथ धाम पहुंच गया। 4 जून को वापस केदारनाथ से चला। 16 किमी की पैदल यात्रा के बाद 198 किमी बाइक चलाकर उत्तराखंड के शिवपुरी में आया। यहीं नदी के बीचों-बीच कैंप में ठहरा। 5 जून को शिवपुरी में रिवर राफ्टिंग करने के बाद नीलकंठ महादेव, ऋषिकेश, हरिद्वार होते हुए 198 किमी बाइक चलाकर देहरादून पहुंचा। 6 जून का देहरादून से चला। दोपहर में पावंटा साहिब पहुंचा। फिर वहां से चंडीगढ़ होते हुए कुरुक्षेत्र तक का सफर किया। इस दिन कुल 364 किमी बाइक चलाई। 7 जून को कुरुक्षेत्र देखते हुए पानीपत पहुंचा। यहां पानीपत के युद्धस्थलों को देखने के बाद आगे बढ़ा। पानीपत के बाद जींद, राखीगढ़ी, हांसी होते हुए भिवानी पहुंचा। इस तरह इस दिन 283 किमी की दूरी तय की। अब आगे..

राजस्थान में 50 डिग्री से ज्यादा टेम्प्रेचर और 2 बार गाड़ी पंचर, चलो इसी बहाने भरी दोपहरी में थोड़ा आराम करने का समय तो मिला।

30 मई से 10 जून 2016 के बीच इस तरह अकेले बाइक से की थी 3850 किमी की यात्रा।

8 जून 2016 का दिन:  भिवानी में रात गुजारने के बाद सुबह जल्दी चलने की तैयारी की। रात में जब आसपास के बारे में पता किया तो यहां से 10 किमी की दूरी पर मीतात्थल के बारे में पता लगा। ये हड़प्पा सभ्यता की साइट है। मैंने वहां जाने की तैयारी की।

भिवानी के होटल मौर्या में ठहरा।


सुबह 7 बजे मीतात्थल के लिए निकला। यहां भी जब जगह के बारे में पूछा तो गांव के आधार पर ही पता बताया लेकिन बिल्कुल सटीक। 7.30 बजे मैं मीतात्थल गांव में था। चौड़ी सड़कें और आयताकर बने हुए घर। आज भी हड़प्पा सभ्यता की तरह गांव नजर आया। मैंने यहां हड़प्पा साइट के बारे में गांववालों से पूछा तो कईयों ने तो इसे जानने से ही इनकार कर दिया। फिर मैंने दूसरे तरीके से बात की तो वह बोले कि ऐसी जगह है तो लेकिन उसे 'खेड़ा' कहते हैं। शायद वही जगह होगी। 

मीतात्थल गांव में ग्रामीण, हड़प्पा साइट की जानकारी देते हुए। गांव की चौड़ी सड़कें इसकी प्राचीनता को बताती हैं।



फिर गांव से 3 किमी आगे चला। मुख्य सड़क से जब पगडंडी पकड़ी तो रास्ता बताने वाला कोई नजर ही नहीं आया।  नहर के किनारे आगे चलता गया। एक जगह किसान खेत में हल चलाता मिला तो उससे उस खेड़े की बारे में जानकारी ली। उसने जो जगह बताई वह तो रास्ते में ही छोड़कर आगे बढ़ आया था। फिर वापस गया तो देखा, वहां तो सिर्फ टीला नजर आ रहा था और उस टीले पर मिट्टी के बर्तनों के अवशेष फैले हुए थे। 


पगडंडियों पर चलकर पहुंचा मीतात्थल।

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टीले के आसपास खेती हो रही है।
यहां खुदाई का कोई चिन्ह नजर नहीं आ रहा था। पास में ही एक पेड़ था और एक हड्डी डली हुई थी। उस सन्नाटे में बिल्कुल अकेला था। वहीं मुझे कुछ ऐसे पैरों के निशान दिखे जो आम इंसान से काफी बड़े थे। ये सबकुछ बहुत रहस्यमय लग रहा था

टीले पर जगह-जगह बिखरे पड़े हैं मिट्टी के बर्तनों के अवशेष।



पहले मैं इसे किसी इंसान की हड्डी समझा, लेकिन गांववालों ने बताया कि ये जानवर की है। ये पेड़ भी रहस्यमय नजर आ रहा था।

मिट्टी में पैरों के निशान, जो आम आदमियों से बड़े नजर आ रहे हैं।


  • इसकी खुदाई सन् 1968 ई. में की गयी।
  • हड़प्पा नगरों के समान ही यह नगर भी दो भागों में विभाजित था।
  • इस नगर को योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया लगता है।
  • चौपड़ की बिसात के नमूने की सड़कों और गलियों के दोनों ओर घर बसे हुए थे, जिनके बनाने में कच्ची ईंटों का प्रयोग किया गया था।
  • ऐसी ही ईंटें कालीबंगा से प्राप्त हुई हैं।
  • यहाँ से कई प्रकार के मृद्भाण्ड भी प्राप्त हुए हैं।
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टीले की खुदाई में इस तरह निकला था मीतात्थल। 

फिर मैंने वहां से वापस लौटना शुरू किया तो खेत में कुछ लोग दिखे। उनसे इस बारे में जानकारी ली तो वह इस खेड़े के बारे में बताने लगे। उनमें से एक व्यक्ति को साथ लेकर मैं वापस खेड़े पर आया और फिर यहां के बारे में पता किया। उन्होंने उस जगह दिखाया जहां तब खुदाई हुई थी, जब बंशीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री थे। इस जगह का नाम खेड़ा पड़ने का कारण उन्होंने बताया कि जो बस्ती जमीन में दफन हो जाती है, उसे खेड़ा कहते हैं।

टीले के बारे में जानकारी देते ग्रामीण।
उन्होंने बताया कि पहले ये टीला बहुत बड़ा था। बरसात में यहां ढेर सारी चूडिया सतह के ऊपर दिखने लगती थी। इस टीले में सोने के सिक्के भी निकले। उसे गाड़ी में भरकर ले जाया गया था।

बरसात में टीले से निकल कर बाहर बहने लगती हैं चूड़िया।

इस जगह पर हुई थी खुदाई। अब आता है ऐसा नजर।


भिवानी शहर में लगी चौधरी देवीलाल की प्रतिमा।

इस जगह के बारे में जानकारी लेकर 8.40 पर वापस भिवानी आ गया। अब यहां से आगे की यात्रा पर निकला।   


आगे की यात्रा अगले लेख में....


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