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Friday, September 13, 2019

जब आधी रात को छोड़ना पड़ी रुकने की जगह, अनजान रास्तों पर बिना हैडलाइट के 110 की स्पीड पर बाइकिंग

गुजरात के जामनगर से निकलकर हड़प्पा संस्कृति की भारत में सबसे बड़ी साइट धौलावीरा देखने के लिए  मैँ निकला जो कच्छ के रण के बीच में था। रास्ते में एक जगह पेट्रोल और पैसे खत्म हो गए तो किसी तरह उसकी व्यवस्था की। 

रास्ता ही जिंदगी है, जिंदगी ही रास्ता है
जामनगर से सुबह 7 बजे निकलना हुआ। दोपहर 12 बजे जामनगर से 167 किलोमीटर दूर सामख्याली पहुंचा। यहां से धौलावीरा जाने का रास्ते था लेकिन वह मुझे पता नहीं चल पाया था। मैप में भचाऊ से धौलावीरा जाने का रास्ता दिख रहा था जो शार्टकट था इसलिए मैं यहां से आगे निकल लिया। सामख्याली से 17 किलोमीटर आगे भचाऊ था। यहां दैनिक भास्कर के रिपोर्टर से पहले ही बात हो गई थी तो वह मुझे अपने ऑफिस ले गए। यहां आकर पता लगा कि भचाऊ वाला रास्ता तो अब बंद हो गया है। वापस सामख्याली से जाना पड़ेगा या फिर भुज से जाना होगा। 

भचाऊ में दैनिक भास्कर के मित्र
खैर अब आगे तो बढ़ चुके थे इसलिए पीछे लौटने का सवाल ही नहीं था। यहां पर थोड़ा आराम कर साढ़े 3 बजे निकले और  साढ़े 4 बजे गांधीधाम पहुंचे जो भचाऊ से 35 किलोमीटर दूर था। 

गांधीधाम 

गांधीधाम से 13 किलोमीटर दूर कांडला पोर्ट था तो वहां भी चल दिए। रास्ते में दोनों तरफ समुद्री पानी भरा था जिसमें नमक बन रहा था। साथ ही यहां सैकड़ों की संख्या में साइबेरियन प्रवासी सारस पक्षी दिखे जो गुलाबी कलर के थे और बहुत ही खूबसूरत दिखाई दे रहे थे। 

कांडला सी पोर्ट 

कांडला से वापस गांधीधाम आना पड़ा और फिर गांधीधाम से 55 किलोमीटर दूर मुंद्रा पोर्ट पहुंचा। यहां पर अडानी ग्रुप की ऑयल की रिफायनरी हैं। यहां हर तरफ लाल ही लाल रंग नजर आता है। मुंद्रा तक पहुंचते पहुंचते 7 बज चुके थे और अभी भुज काफी दूर था। मुंद्रा से 52 किलोमीटर की दूरी तय कर सवा 8 बजे मांडवी पहुंचा जो एक खूबसूरत बीच था। बीच के किनारे नारियल के पेड़ों की श्रंखला बनी हुई थी। यहां तेज हवा के कारण बहुत सारी पवन चक्कियां भी लगी हुई थीं। यहां का सनसेट बहुत ही खूबसूरत होता है। उस सनसेट के कई फोटो मैंने वहीं एक लोकल बंदे से लिए। 

मांडवी बीच

यहां ऐसा लग रहा था कि बस यहीं रुक जाएं। बाइक में लाइट भी नहीं थी। बाइक की हैडलाइट दो दिन पहले हुए एक्सीडेंट में खराब हो गई और यहां रास्ते में उसे ठीक कराने के पैसे भी नहीं थे। शरीर भी थक गया था लेकिन यहां रुकने से पूरे एक दिन की बर्बादी होनी थी, सो आगे चलना पड़ा। 

इसके बाद शुरू हुई जिंदगी की सबसे खतरनाक राइड। मांडवी से भुज 65 किलोमीटर दूर था और मांडवी में ही सवा 9 बज चुके थे। यह एक अनजान रास्ता था और बाइक में लाइट भी नहीं थी। रास्ते का भी पता नहीं था कि बीच में कोई कस्बा या गांव पड़ेगा या नहीं। अभी इतना सोच ही रहा था कि वहां से एक बस निकली। मैंने सोच को विराम देते हुए उसी बस की बैकलाइट को आधार बनाते हुए राइड शुरू कर दी। 

शुरू में तो बस 70 की स्पीड से चल रही थी तो मैंटेन हो रहा था लेकिन फिर बस ने स्पीड बढ़ानी शुरू कर दी क्योंकि गुजरात की सड़कें और राज्यों की अपेक्षा उस समय बेहतर थीं। बस की स्पीड 80, 90, 100, 110 तक पहुंची और हमें भी उसी स्पीड से अपनी बाइक भगानी पड़ी। क्योंकि यदि ऐसा नहीं करते तो उस अंधेरे में दूसरे वाहन कब निकलते, पता नहीं और रास्ते में रुक भी नहीं सकते थे। एक समय तो ऐसा आया कि 120 की स्पीड से बस को ही ओवरटेक करना पड़ा। उस समय नई बाइक थी और स्पीड पूरी 140 की खुली हुई थी। यह एक खतरनाक कदम था लेकिन रिस्क लिया। इसका असर यह हुआ कि फिर बस 80 की स्पीड से चलने लगी। उसे भी लगा कि बाइक वाला बस के पीछे इसलिए लगा था कि उसकी रोशनी में वह आगे जा सके। 

खैर 50 मिनट में 65 किलोमीटर की दूरी तय कर सवा 10 बजे भुज आ गए। अब यहां रुकने का ठिकाना ढूंढना था। तभी वहां स्वामीनारायण का मंदिर दिखा तो हमने वहां रुकने की जुगाड़ लगाई। 50 रुपये की पर्ची कटी लेकिन रुकने की जगह थोड़ा अलग जगह थी। अब इतनी रात को कर भी क्या सकते थे। 

भुज
मुझे एक ऐसा कमरा मिला जिसमें पहले से ही दो लोग थे। कमरे में पंखा लगा था और मच्छरों की भरमार थी। एक केयरटेकर था जो आराम से खटिया पर सो रहा था। रात में मोबाइल और कैमरा चार्ज करना था इसलिए अब यहां रुकने के अलावा कोई चारा नहीं था। 

रात को 12 बजे किसी तरह सोने की कोशिश की लेकिन मई की गर्मी और वह भी कच्छ के इलाके में, दम निकाल रही थी। किसी तरह डेढ़ घंटे की नींद ली लेकिन बीच में उठ गया। अब गर्मी और मच्छरों की वजह से सोना नहीं हो पा रहा था। मैं फिर से उस केयरटेकर के पास गया और बोला कि भाई कोई कमरा हो तो दे दो, भले ही 500 रुपये ले लेना लेकिन उसने कहा कि सोना है तो सोओ, नहीं तो जाओ। पता नहीं, क्यों मुझे उसकी बात चुभ गई। ऊपर गया और बैग पैक कर लिया। 10 मिनट में बैग पैक किया और नीचे आ गया। 

अब एक अनजान शहर में रात को बाइक से चलना था, वह भी बिना हैडलाइट की बाइक से। दो दिन पहले ही एक्सीडेंट हुआ था जिसमें हाथ और पैरों में चोट थी लेकिन जुनून सब करवा देता है। थोड़ी देर मैं एक दुकान पर बैठा और पोहा खाकर चाय पी। इस रास्ते पर अच्छी बात यह थी कि यह हाइवे था और पूरे रास्ते में स्ट्रीट लाइट लगी थीं इसलिए ज्यादा चिंता की बात नहीं थी। 

यहां से रात 2 बजे चलना शुरू किया लेकिन आधा घंटे बाद ही नींद आने लगी। तभी वहां रास्ते में एक चाय की दुकान दिखी। वहां एक खटिया भी बिछी थी। चाय वाले की दुकान पर एक बच्चा बैठा था। उससे बातों ही बातों में पता लगा कि यह वह जगह थी जहां भूकंप के बाद सोनिया गांधी आईं थी। यह एक मुस्लिम बहुल बस्ती थी। चाय पीकर मैं वहीं खटिया पर सो गया। सुबह 4 बजे वहां लोगों का आना-जाना शुरू हुआ तो मुझे भी वहां से चलना पड़ा। फिर थोड़ा आगे बढ़ा, तब तक सुबह हो चुकी थी।

लगातार 24 घंटे में 500 किलोमीटर के सफर के बाद यह हालत हो गई थी।
फिर एक चाय की दुकान पर रुका और चाय पीकर वहीं एक पटिया पर सो गया। गहरी नींद की वजह से कुछ अहसास ही नहीं हो रहा था। फिर सुबह पौने सात बजे उठे और मुंह-हाथ धोकर आगे के सफर पर चल दिए।

इस चाय की दुकान पर पटिया पर सोकर बिताई रात।
यह रोमांचक और खतरनाक सफर 7 और 8 मई 2013 का है जब भोपाल से गुजरात की 3433 किमी की पहली बाइक यात्रा पर अकेले निकला था। 

अगली सच्ची कहानी में रोमांच महसूस होगा भारत की सबसे बड़ी हड़प्पा साइट धौलावीरा और कच्छ के रण का... 

Thursday, September 12, 2019

11 दिन की यात्रा और सातवें दिन पैसे खत्म, बीच रास्ते में पेट्रोल खत्म, ऐसे निकला रास्ता

आज काफी लंबी दूरी तय करनी थी इसलिए सुबह 6 बजे उठ गया। सुबह 7 बजे तक मैं गुजरात के जामनगर से निकलने के लिए तैयार था। रात जामनगर के सर्किट हाउस में गुजरी थी जिसमें हमारे मित्र नाथू रामदा जी ने मदद की थी। 


आज यात्रा का सातवां दिन था। यात्रा के लिए जो 8 हजार का बजट रखा था, वह खत्म हो चुका था। सिर्फ 200 रुपये बचे थे और अभी 5 दिन की यात्रा बाकी थी। मुंबई के एक दोस्त को 3 हजार रुपये उधार दे रखे थे, अब उसी पर उम्मीद टिकी थी। उसी उम्मीद के सहारे आगे चला कि दोपहर तक अकाउंट में पैसे आ जाएंगे। 

अभी जामनगर से निकले हुए डेढ़ घंटे ही हुए थे और 40 किलोमीटर की दूरी ही तय की थी कि वही हुआ, जिसका डर था। लिंबुडा वाटिया से  थोड़ा आगे बीच रास्ते पर पेट्रोल खत्म हो गया और पैसे भी। हम हाइवे पर खड़े सोच रहे थे कि अब क्या करें। दोस्त को फोन लगाया तो उसने टका सा जवाब दिया कि पैसे नहीं हो पा रहे। 

कहते हैं कि जब एक रास्ता बंद होता है तो कई नए दरवाजे खुलते हैं, ऐसा ही कुछ उस दिन हुआ। अचानक से बाइक पर सवार एक लड़का आया और मेरे पास आकर रुक गया। उसने मुझसे पूछा कि क्या समस्या है। मैंने उसे बताया कि पेट्रोल खत्म हो गया है, कहां मिलेगा? उसने जवाब दिया कि 20 किलोमीटर आगे पंप है। मैंने उससे कहा कि भाई कुछ पेट्रोल दे दो तो उसने कहा कि मेरी गाड़ी में भी ज्यादा नहीं है। तब मैंने उससे कहा कि मुझे पेट्रोल पंप तक ले चलो, तुम्हारी गाड़ी में भी आने-जाने का डलवा देंगे। वह तैयार हो गया। 


उसके साथ बैठकर मैं 20 किलोमीटर दूर पेट्रोल पंप पर गया। 50 रुपये का पेट्रोल उसकी गाड़ी में डलवाया और 70 रुपये का मैंने लिया। इसी दौरान मैंने भोपाल में अपने एक परिचित सुरेश गर्ग जी को पैसे के लिए कहा तो उन्होंने 3 हजार रुपये अकाउंट में डलवाने का वादा किया। पंप से वापस आकर अनजान और मददगार लड़के ने मुझे छोड़ा और फिर खेतों के बीच उतरकर न जाने कहां चला गया। वहीं, मेरे परिचित ने भी अपना वादा निभाया और जब मेरे पास रास्ते में एक रुपया भी नहीं बचा था, तब मेरे लिए अगले 5 दिन के सफर खर्च की व्यवस्था की। 


इस तरह गुजरात यात्रा में सफर के सातवें दिन एक बड़ी समस्या से आसानी से छुटकारा मिला। इसके बाद रात 10 बजे तक आमरन, मालिला, सामख्याली, भचाऊ, गांधीधाम, कांडला, मुंद्रा, मांडवी होते हुए भुज तक की 436 किलोमीटर बाइकिंग की, वह भी तब जब दो दिन पहले ही एक्सीडेंट हुआ था। 

यह घटना 7 मई 2013 को 3433 किलोमीटर की 100 सीसी बाइक से गुजरात यात्रा के दौरान घटी जिसने मुझे इंसानियत पर भरोसा करना सिखाया। 

रोमांचक यात्रा का रोचक वृतांत जारी रहेगा...

Shyam Sundar Goyal
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Monday, August 5, 2019

Friendship With History: एक शाप से उजड़ गया था यह शानदार किला, तुगलकी फरमान का था गवाह

कहा जाता है कि देश की राजधानी दिल्ली 7 बार उजड़ी और बसी। हालांकि बताने वाले तो कहते हैं कि दिल्ली सात बार नहीं बल्कि 16 बार बसी और उजड़ी लेकिन इस बात के अभी तक प्रमाण नहीं हैं। खैर, कोई बात नहीं, हमने इस बार के फ्रेंडशिप डे को कुछ अलग तरह से मनाने की सोची और इस बार दोस्त बनाया अपने इतिहास को।




फेसबुक पर इवेंट पेज पर जानकारी लगी कि रविवार 4 अगस्त को 'सैर-ए-दिल्ली' पेज पर एक इवेंट की जानकारी है जिसमें तुगलकाबाद हेरिटेज वॉक की जानकारी दी गई थी। तुगलकों  के बारे में इतिहास में पढ़ रखा था कि इसी वंश के एक सुल्तान का नाम सनकी सुल्तान के रूप में इतिहास में  दर्ज है। यही एक चीज थी जिसने वहां जाने के लिए मजबूर कर दिया। 

हेरिटेज वॉक का समय सुबह 8 से 11 का था। खैर, सुबह साढ़े पांच उठे और सुबह 6.30 बजे की 34 ए नंबर की बस नोएडा सेक्टर 19 से पकड़ी। बस का 50 रुपये में पास बनवा लिया तो आराम से अब पूरे दिन दिल्ली में कहीं भी घूमने का इंतजाम हो गया। बस से पहुंचना तो 8 बजे तक था लेकिन सुबह खाली रास्तों को कारण सवा 7 बजे हम स्पॉट पर थे। अब वहां 25 रुपये का टिकट लिया और अन्य साथियों का इंतजार करने लगे। ठीक 8 बजे वहां फरीदाबाद, गुड़गांव और दिल्ली से आए करीब 50 साथी थे जो इस हेरिटेज वॉक का हिस्सा बनने वाले थे। 


किले के अंदर पहुंचकर सबका परिचय हुआ। इस किले के बारे में रोचक जानकारी देने के लिए यूसुफ भाई थे जो दिल्ली में बसे सातों शहरों की कई बार हेरिटेज वॉक करा चुके थे। इस किले और 14वीं शताब्दी में बसी तीसरी दिल्ली के बारे में उन्होंने तारीख ए फिरोजशाही और रिहाला किताब से जानकारी जुटाई थी। 

परिचय के बाद यूसुफ ने ट्रैकर्स को दिल्ली में बसे सातों शहरों के बारे में जमीन पर मैप बनाकर जानकारी देना शुरू की। तब पता चला कि हम जिस किले में खड़े थे, वह तीसरी बार बसी दिल्ली थी जिसे तुगलक वंश के ग्यासुद्दीन तुगलक ने 1320 से 1325 ईसवी के बीच बसाया था। इसने ही खिलजी वंश के बाद तुगलक वंश चलाया था। जब हमें कोई फरमान अजीब लगता है तो कहते हैं कि यह तुगलकी फरमान है। यह शब्द इसी तुगलक वंश की ईजाद है जिसे चरम पर ग्यासदुद्दीन तुगलक के बेटे मोहम्मद बिन तुगलक ने पहुंचाया।



आज के हमारे गाइड ने यहीं बताया कि ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक, सबसे पहली दिल्ली महरौली-लालकोट, दूसरी सीरी, तीसरी तुगलकाबाद, चौथी, जहांपनाह, पांचवी  फिरोजाबाद, छठवीं दीनपनाह और सातवीं शाहजहानांबाद है। जिसे हम पुरानी दिल्ली कहते हैं वह सबसे नई बसी हुई दिल्ली है। 


किले पर देखने लायक कई जगह थी जो इतिहास को हमारे सामने जीवंत कर रही थीं। एक शानदार बावली थी जिसमें सीढ़ियों से नीचे उतरने का रास्ता था। इस बावली के नीचे जो चट्टान नजर आ रही थी, वह अरावली पर्वतमाला का हिस्सा थी।


इसके बाद थोड़ा सा आगे चले तो एक घुमावदार दरवाजे के सामने सभी रुक गए। इस किले में प्रवेश करने के ऐसे 13 दरवाजे थे। इनका घुमावदार रास्ता इसलिए था कि दुश्मन के आक्रमण के समय सभी सचेत हो जाएं।

इसके आगे भी कुछ जगह थी जहां अन्न का भंडार करके रखा जाता था लेकिन वहां जाने का समय नहीं था। इसके बाद वहां सुल्तान के महल के भी भग्नावेष नजर आए जो एक समय दुनिया का श्रेष्ठ महल था। यह किला साढ़े 6 किलोमीटर में फैला था लेकिन अब 2 किलोमीटर का ही हिस्सा बचा हुआ है। 


किले में ही एक ऐसी जगह थी जो थोड़ा जमीन के नीचे थी और कई कोठरियां बनी थी। गाइड ने बताया कि यह शायद कैदियों को रखने की जगह या मीना बाजार था। इसमें चलना भी एक रोमांच की तरह था। 


किले में दूर तक नजर रखने के लिए चारों दिशाओं में चार वॉच टॉवर भी बनाए गए थे। इसके अलावा यहां एक और गहरी बावली नजर आई जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियां नहीं थीं। गाइड ने बताया कि इसे विजय मा जगह कहा जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि मौत की सजा पाए कैदियों को इसमें फेंक दिया जाता था। बावली में बड़े-बड़े मगरमच्छ थे जो नीचे फेंके गए कैदियों को खा जाते थे। 


इस किले से कुछ शाप भी जुड़े थे इसलिए उस समय का दुनिया का यह भव्यतम किला कुछ ही सालों में वीरान हो गया। इसके बारे में भी एक रोचक कहानी है। कहा जाता है कि ग्यासुद्दीन तुगलक ने किले को बनवाने के लिए दिल्ली की सारी जनता को मजदूर के रूप में लगा दिया। प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने उनके फरमान को मानने से इनकार किया तो सुल्तान ने उन्हें सजा देनी चाही। तब औलिया ने शाप दिया कि जिस किले का तुम्हें इतना घमंड है वह वीरान हो जाएगा। यह किला आधा उजड़ा और आधा गूजरों के कब्जे में चला जाएगा। 



निजामुद्दीन औलिया ने एक और शाप ग्यासुद्दीन तुगलक को दिया था। बंगाल विजय से लौटते समय सुल्तान ने अपने बेटे जौना खान को कहा कि मेरे दिल्ली आने से पहले निजामुद्दीन औलिया से कहो कि वह दिल्ली छोड़कर कहीं चले जाएं नहीं तो हम उसे छोड़ेंगे नहीं। तब औलिया साहब ने कहा कि अभी तो दिल्ली दूर है। उनकी बात सच साबित हुई। इलाहाबाद के पास कड़ा नाम की जगह पर जौना खां ने अपने पिता का सम्मान करने के लिए एक बड़ा शामियाना लगाया। जब उस पर हाथी चले तो वह ढह गया जिसमें ग्यासुद्दीन तुगलक की मौत हो गई। उसके बाद दिल्ली के तख्त पर मोहम्मद बिन तुगलक बैठा जिसने 1325 से 1351 ईसवी तक दिल्ली सल्तनत पर शासन किया।



किले के सामने दूसरे हिस्से में ही ग्यासुद्दीन तुगलक, उनकी पत्नी और उनके बेटे मोहम्मद बिन तुगलक की कब्र बनी हुई है। तुगलक वंश के ही फिरोजशाह तुगलक की कब्र हौज खास किले में बनी हुई है। 



यह सब देखने में 11 बजे चुके थे। अब वहां से निकले तो तुगलकाबाद गांव के रास्ते पर पहुंचे। यहीं 20 रुपये की शानदार बिरयानी और 20 रुपये की आलू टिक्की खाकर पेट पूजा की और फिर 34 नंबर की ही बस पकड़कर वापस अपने ठिकाने नोएडा सेक्टर 19 ए में 2 बजे तक लौटकर आए। 


इस तरह 200 रुपये हे्रिटेज वॉक का चार्ज, 25 रुपये का टिकट, 75 रुपये का खाना-पीना, 50 रुपये बस का किराया लगा। इस तरह 350 रुपये में सात में से एक दिल्ली को देखने का अनुभव लिया।  

Shyam Sundar Goyal
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Sunday, January 6, 2019

स्कूबा डाइविंग में ऑक्सीजन खत्म, 10 सेकंड में होने वाली थी मौत लेकिन...

6 सालों में भारत (Solo India Trip on Bike) के 20 राज्यों में 23,500 किलोमीटर की बाइक से यात्रा के दौरान कुछ ऐसे पल भी आए जब सीधे मौत ने दस्तक दे दी। कुछ ही सेकंड ही आप मरने वाले हों और फिर उस स्थिति से बाहर आना। ऐसी ही एक घटना 28 मार्च 2017 को महाराष्ट्र के मालवण तट पर स्कूबा डाइविंग के दौरान घटी जिसके पास समुद्री सिंधुदुर्ग किला है।

प्रतीकात्मक फोटो
ये सफर नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए
आग का दरिया है और तैर कर पार करना है...

कुछ इसी तरह के अनुभव भारत यात्रा (Journey of India) में हुए हैं। आज मैं आपको बताने जा रहा हूं 28 मार्च 2017 की उस घटना के बारे में जब मैं साउथ इंडिया (Journey of South India) की 7214 किमी की यात्रा पर था।गोवा (Journey of Goa) से लौटते हुए समुद्री किले सिंधुदुर्ग को देखने की इच्छा हुई। सिंधुदुर्ग किला (Sindhudurg Fort)  महाराष्ट्र के मालवण तट पर है। मालवण से वहां जाने लिए स्टीमर चलते हैं।


मैं मालवण गया तो था किला देखने लेकिन वहां जब देखा कि 800 रुपए में स्कूबा डाइविंग हो रही है तो मैंने पहले स्कूबा डाइविंग (5 best places to go scuba diving in India) की सोची, उसके बाद किला घूमने की। अपनी बाइक (Bike Trip)  वहीं किनारे खड़े की और काउंटर पर जाकर 800 रुपए की रसीद कटाई। उस स्टीमर पर और भी लोग सवार थे जो स्कूबा डाइविंग के लिए ही बैठे थे।



मेरे समुद्र में उतरने से पहले तीन लोग स्कूबा डाइविंग करके आ चुके थे। उनके समंदर की तलहटी में रंगीन मछलियों और चट्टानों के साथ बेहतरीन फोटो आए थे। समंदर के अंदर वीडियो और फोटोग्राफी टिकट में ही शामिल थी।

मेरा भी नंबर आया तो कमर में लोहे का भारी बेल्ट बांध दिया गया। पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर और नाक को मास्क से पैक कर दिया गया। अब सिर्फ मुंह से सांस लेनी और छोड़नी थी। मुझे तैरना नहीं आता था लेकिन स्कूबा डाइविंग में ये कोई बाधा नहीं थी। 5 मिनट की प्रैक्टिस के बाद पहली बार गहरे समंदर में उतर गया। मैंने स्टीमर के पास ही गोता लगा लिया और पानी के नीचे गोता लगाने लगा।

\महाराष्ट्र के मालवण में सिंधुदुर्ग समुद्री किले के पास स्कूबा डाइविंग Scuba diving.
पहले तो सामने धुंधला पानी दिखा लेकिन जैसे ही तलहटी पर पहुंचा तो दुनिया ही बदल गई। आसपास ढेर सारी रंगीन मछलियां और साफ पानी। ऐसा लगा कि स्वर्ग में आ गए। सामने इंस्ट्रक्टर फोटो खींचने के लिए कैमरा सेट करने लगा। मैं भी एक समुद्री चट्टान पकड़कर इस बेहतरीन पल को एन्जॉय कर रहा था कि अचानक सबकुछ बदलने लगा।

मुझे अचानक लगा कि जैसे ऑक्सीजन खत्म हो गई। सांस लेने में तकलीफ होने लगी। ऊपर से समंदर के पानी का प्रेशर। मुझे लगा कि शायद मुंह से आक्सीजन की नॉब निकल गई है। मैंने उसे बाहर निकालकर फिर से आक्सीजन अंदर खींची तो समंदर का नमकीन पानी फुल प्रेशर से मुंह के अंदर घुस गया और सीधा दिमाग पर अटैक करने लगा। कानों के अंदर ऐसा लगने लगा जैसे वे फट जाएंगे।

फिर नॉब बाहर निकाली और सांस खींची, तब भी वही स्थिति। सिर्फ 5 सेकंड में ऐसा लगा कि कुछ ही सेकंड में मौत होने वाली है। सामने मेरे इंस्ट्रक्टर थे लेकिन उसे कुछ कह नहीं पा रहा था और न ही उस समय वह इशारा याद आ रहा था जो खतरे के समय करने से इंस्ट्रक्टर मुझे बचा सकता था। दिमाग धीरे-धीरे शून्य होने लगा।



ऐसे में मेरी विल पॉवर (Will Power)  काम में आई। मैंने तुरंत फैसला लिया कि अभी मुझे ही कुछ करना पड़ेगा लेकिन क्या, ये समझने में मैंने ज्यादा देर नहीं की। मुझे ये भी नहीं पता था कि मैं समंदर में कितनी गहराई पर हूं, लेकिन फैसला किया तलहटी में मरने से अच्छा है कुछ प्रयास करके मरना... और मैंने सीधा ऊपर की तरफ उठना शुरू कर दिया। 10 सेकंड में तेजी से ऊपर चढ़ते हुए सतह की तरफ बढ़ने लगा और जब ऊपर आया तो पेट के अंदर खारा पानी भर चुका था।

इंस्ट्रक्टर ने ऊपर पूछा कि क्या हुआ था। फोटो नहीं खिंच पाए हैं फिर से नीचे जाना पड़ेगा लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं बची थी। जल्दी से बोट पर आया और पेट से पानी निकाला। करीब आधा घंटे बाद दिमाग कुछ सोचने-समझने लायक हो पाया। खारे पानी ने सबसे पहले दिमाग पर ही अटैक किया था जिससे आपके निर्णय की क्षमता खत्म हो जाती है। समंदर में फोटो न खिंचने का मलाल रहा लेकिन ये भी सत्य था कि इसी समंदर में मेरी कब्र भी बन सकती थी। खैर कोई बात नहीं, उसके बाद आगे की यात्रा पर चल दिए...

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Wednesday, November 30, 2016

Solo #Biking: इन्हें कहा जाता है कलयुग के श्रीकृष्ण, जब पुलिसकर्मियों ने मुझे ठहरा दिया नशे का सौदागर

                      केदारनाथ ज्योर्तिलिंग की बाइक से 3850 किलोमीटर की अकेले रोमांचक यात्रा


                                         PART-16 भिवानी से अजमेर तक का सफर


30 नवंबर, भोपाल। भोपाल से 30 मई को यात्रा पर निकलने के बाद 30 की रात को ही 231 किमी की दूरी तय कर चंदेरी पहुंचा। उसके बाद दूसरे दिन 31 मई को 371 किमी की दूरी तय कर आगरा पहुंचा। 1 जून को आगरा से हस्तिनापुर 319 किमी की दूरी तय कर पहुंचा। 2 जून को 305 किमी की यात्रा कर हस्तिनापुर से रुद्रप्रयाग पहुंचा। 

3 जून को रुद्रप्रयाग से चला और 77 किमी दूर गौरीकुंड पहुंचा। यहां से केदारनाथ मंदिर की 16 किमी की चढ़ाई शुरू की। 3 जून की शाम केदारनाथ धाम पहुंच गया। 4 जून को वापस केदारनाथ से चला। 16 किमी की पैदल यात्रा के बाद 198 किमी बाइक चलाकर उत्तराखंड के शिवपुरी में आया। यहीं नदी के बीचों-बीच कैंप में ठहरा। 5 जून को शिवपुरी में रिवर राफ्टिंग करने के बाद नीलकंठ महादेव, ऋषिकेश, हरिद्वार होते हुए 198 किमी बाइक चलाकर देहरादून पहुंचा। 6 जून को देहरादून से चला। दोपहर में पावंटा साहिब पहुंचा। फिर वहां से चंडीगढ़ होते हुए कुरुक्षेत्र तक का सफर किया। इस दिन कुल 364 किमी बाइक चलाई। 7 जून को कुरुक्षेत्र देखते हुए पानीपत पहुंचा। यहां पानीपत के युद्धस्थलों को देखने के बाद आगे बढ़ा। पानीपत के बाद जींद, राखीगढ़ी, हांसी होते हुए भिवानी पहुंचा। इस तरह इस दिन 283 किमी की दूरी तय की। 8 जून को भिवानी के पास हड़प्पा सभ्यता का स्थल मीतात्थल देखा। अब आगे..

जयपुर का हवा महल। 8 जून 2016।


मीतात्थल से वापस भिवानी आकर अब आगे के सफर की तैयारी शुरु की। सुबह 9 बजे इस शहर को छोड़कर आगे बढ़ गए। सुबह साढ़े 10 बजे लोहारु पहुंचा। यह हरियाणा और राजस्थान का बॉर्डर है। 

भिवानी में देवीलाल की प्रतिमा।

लोहारु।

लोहारु शहर।

इस की वजह से करीब 15 मिनट तक ट्रैफिक रुका रहा।
 लाेहारु शहर पार करते ही राजस्थान की झलक दिखने लगी थी। गर्मी तेज पड़ने लगी थी। हर जगह कंटीली झाड़ियां नजर आने लगी थी। 10 बजकर 50 मिनट पर हरियाणा-राजस्थान बॉर्डर पर था। यहां से अब अागे राजस्थान में सफर शुरु करना था। 

हरियाणा-राजस्थान बार्डर।


अब प्यास भी तेज लगने लगी। एक जगह प्याऊ दिखाई दिया लेकिन ये पानी की अपने आप में अनोखी व्यवस्था थी। 8 मटकों को इस तरह पाइप से जोड़ा गया था कि सभी का पानी एक ही नल से निकल रहा था। इस तरह ताजा पानी पूरे दिन उपलब्ध हो जाता था। गर्मी में ठंडा पानी, इस रेगिस्तान में और क्या चाहिए। 



अब गर्मी तेज पड़ने लगी थी। जून का महीना चल रहा था और राजस्थान में गर्मी को लेकर रेड अलर्ट जारी था। मैं भी गर्मी से परेशान होने लगा तो अपने जूतों में पानी भर लिया। हर तरफ से खुद को ढंक लिया था लेकिन धूप की तेजी का क्या? आधा घंटे में ही जूतों में भरा पानी भाप बनकर उड़ गया। हर 15 मिनट पर गला सूख रहा था और पानी की जरूरत पड़ती थी। रेतीली हवाएं भी चलना शुरू हो गई थीं। 


झुंझनू।


किसी तरह दोपहर 12 बजे झुंझनू पहुंचा। यहां गन्ने का रस पीकर थोड़ा तरोताजा हुआ। अब यहां से खाटू श्यामजी जाने के लिए दो रास्ते थे। एक सीकर होकर, दूसरा खंडेला होकर। मैं इस दूसरे रास्ते से आगे बढ़ा। रास्ते में गधे से चलने वाली गाडि़यां दिखाई देने लगी थीं। 

झुंझनू।





गधा गाड़ी।



दोपहर 12 बजकर 40 मिनट पर पेट्रोल पंप पर रुका। यहां टंकी को फुल करवाया। इस पंप के चारों तरफ रेत ही रेत नजर आ रही थी। 





यहां से आगे बढ़ा तो अब रेगिस्तान के जहाज ऊंट दिखाई देने लगे थे। 




रास्ते में अरावली पर्वतमाला मिली। ये पर्वत कभी विंध्याचल पर्वतमाला से भी ऊंचे थे लेकिन घिस-घिसकर कम ऊंचे रह गए हैं। 

अरावली पर्वतमाला।
 सवा 2 बजे खंडेला में पहुंचा। ये एक कस्बा लग रहा था। यहीं पर गाड़ी पंक्चर हो गई। किस्मत से पास में ही पंचर की दुकान मिल गई। वहीं पास में बैग सिलने की दुकान भी थी। यहां बैग की डोरी सिलवाई जो केदारनाथ से आते समय टूट गई थी। इस वजह से बैग फटता जा रहा था। 

खंडेला।


थोड़ी-थोड़ी देर में दो पंचर।
पंचर बनवाने के बाद खंडेला से आगे बढ़ा। करीब 5 किमी आगे जाने के बाद वही ट्यूब फिर फट गया। ट्यूब को बनवाने के लिए फिर से उसी दुकान पर वापस आया लेकिन इस बार ट्यूब पूरी तरह नष्ट हो गया था और उसके पास दूसरा ट्यूब भी नहीं था। फिर करीब 2 किमी ऐसे ही गाड़ी चलाकर एक दुकान पर गया। उसके पास भी ट्यूब नहीं था लेकिन उसने कहीं और से व्यवस्था कर दी। हालांकि इसके लिए मुझे 150 रुपए के 350 रुपए देने पड़े। 



इस घटना के बाद मुझे गर्मी में एक घंटे की राहत मिल गई। मैं उसी दुकान पर सो गया। इधर गाड़ी में काम होता रहा, उधर में राजस्थानी गानों को सुनते हुए नींद पूरी करने लगा। 



सवा 4 बजे खंडेला से गाड़ी सही कराके निकला। यहां मुझे रास्ते में कई ढाणियां नजर आई हैं जिनके नाम अजीब से थे। 



पौने 5 बजे मैं खाटूश्याम जी के दरबार में पहुंच गया। यहां मंदिर में खाटूश्याम जी के दर्शन किए। खाटूश्यामजी को तीन बाणधारी कहा जाता है और जिन्हें हार प्राप्त होती है, उन्हें जिताने वाला कहा जाता है। यहां चोर भी चाेरी करने के बाद इनका हिस्सा चढ़ाते हैं। यहां हरियाणा से श्रद्धालु पैदल चलकर आते हैं। 


खाटू श्यामजी।



खाटू श्याम जी को कहा जाता है कलयुग में कृष्ण का अवतार

हिन्दू धर्म के अनुसार, खाटू श्याम जी कलियुग में कृष्ण के अवतार हैं, जिन्होंने श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त किया था कि वे कलियुग में उनके नाम श्याम से पूजे जाएँगे। श्री कृष्ण बर्बरीक के महान बलिदान से काफ़ी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि जैसे-जैसे कलियुग का अवतरण होगा, तुम श्याम के नाम से पूजे जाओगे। 

खाटूश्याम जी।

तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया
श्री श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे अति बलशाली गदाधारी भीम के पुत्र घटोत्कच और नाग कन्या मौरवी के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ तथा श्री कृष्ण से सीखी। भगवान् शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किये; इस प्रकार तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।

कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर चल पड़े
महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुए तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर चल पड़े।

जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा उसी को अपना साथ देगा
सर्वव्यापी श्री कृष्ण ने ब्राह्मण भेष धारण कर बर्बरीक के बारे में जानने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है; ऐसा सुनकर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिए पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तूणीर में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो पूरे ब्रह्माण्ड का विनाश हो जाएगा। यह जानकर भगवान् कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस वृक्ष के सभी पत्तों को वेधकर दिखलाओ। वे दोनों पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। बाण ने क्षणभर में पेड़ के सभी पत्तों को वेध दिया और श्री कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था; बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए अन्यथा ये बाण आपके पैर को भी वेध देगा। तत्पश्चात, श्री कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा; बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन को दोहराया और कहा युद्ध में जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा उसी को अपना साथ देगा। श्री कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की निश्चित है और इस कारण अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में चला जाएगा।

शीश के दानी कहलाये
अत: ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण ने वीर बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की। बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया और दान माँगने को कहा। ब्राह्मण ने उनसे शीश का दान माँगा। वीर बर्बरीक क्षण भर के लिए अचम्भित हुए, परन्तु अपने वचन से अडिग नहीं हो सकते थे। वीर बर्बरीक बोले एक साधारण ब्राह्मण इस तरह का दान नहीं माँग सकता है, अत: ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की। ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ गये। श्री कृष्ण ने बर्बरीक को शीश दान माँगने का कारण समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पूर्व युद्धभूमि पूजन के लिए तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय के शीश की आहुति देनी होती है; इसलिए ऐसा करने के लिए वे विवश थे। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अन्त तक युद्ध देखना चाहते हैं। श्री कृष्ण ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। श्री कृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न होकर बर्बरीक को युद्ध में सर्वश्रेष्ठ वीर की उपाधि से अलंकृत किया। उनके शीश को युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया; जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया था इस प्रकार वे शीश के दानी कहलाये।

बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी
महाभारत युद्ध की समाप्ति पर पाण्डवों में ही आपसी विवाद होने लगा कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है? श्री कृष्ण ने उनसे कहा बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये और पहाड़ी की ओर चल पड़े, वहाँ पहुँचकर बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्री कृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उपस्थिति, युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो शत्रु सेना को काट रहा था। महाकाली, कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।

कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे
श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है।

खुदाई के बाद वह शीश प्रकट हुआ
उनका शीश खाटू नगर (वर्तमान राजस्थान राज्य के सीकर जिला) में दफ़नाया गया इसलिए उन्हें खाटू श्याम बाबा कहा जाता है। एक गाय उस स्थान पर आकर रोज अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी। बाद में खुदाई के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिए एक ब्राह्मण को सूपुर्द कर दिया गया। एक बार खाटू नगर के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिए और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिए प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कँवर द्वारा बनाया गया था। मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर 1720 ई. में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर इस समय अपने वर्तमान आकार ले लिया और मूर्ति गर्भगृह में प्रतिस्थापित किया गया था। मूर्ति दुर्लभ पत्थर से बना है। खाटूश्याम परिवारों की एक बड़ी संख्या के परिवार देवता है।





खाटू श्यामजी।
शीश के दानी
जब श्री कृष्ण ने उनसे उनके शीश की मांग की तो उन्होंने अपना शीश बिना किसी झिझक के उनको अर्पित कर दिया और भक्त उन्हें शीश के दानी के नाम से पुकारने लगे। श्री कृष्ण पाण्डवों को युद्ध में विजयी बनाना चाहते थे। बर्बरीक पहले ही अपनी माँ को हारे हुए का साथ देने का वचन दे चुके थे और युद्ध के पहले एक वीर पुरुष के सिर की भेंट युद्धभूमिपूजन के लिए करनी थी इसलिए श्री कृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा।

लखदातार
भक्तों की मान्यता रही है कि बाबा से अगर कोई वस्तु मांगी जाती है तो बाबा लाखों-लाख देते हैं इसीलिए उन्हें लखदातार के नाम से भी जाना जाता है।

हारे का सहारा
जैसा कि इस आलेख मे बताया गया है बाबा ने हारने वाले पक्ष का साथ देने का प्रण लिया था, इसीलिए बाबा को हारे का सहारा भी कहा जाता है।

मोरछड़ी धारक
बाबा हमेशा मयूर के पंखों की बनी हुई छड़ी रखते हैं इसलिए इन्हें मोरछड़ी वाला भी कहते हैं।



खाटूश्यामजी के दर्शन कर शाम 6 बजे आगे की सफर पर चला। अब यहां से जयपुर कुछ ही दूरी पर था। रास्ते में एक तरबूज की दुकान पर रुका और इन्हें खाकर गर्मी शांत की। 





सवा 7 बजे मैं जयपुर शहर के प्रवेश द्वार पर था। यहां एक मन किया कि सीधे अजमेर निकला जाए। जयपुर मैं  2 बार आकर घूम चुका था। यहां के किले और अन्य घूमने की जगह देख चुका था। लेकिन फिर मन किया जब यहां तक आए हैं तो कम से कम हवा महल तो देख ही आएं। 


जयपुर शहर।
यहां तक फोटो और वीडियो से मोबाइल कार्ड भर चुका था। एक मोबाइल की दुकान से 16 जीबी का कार्ड खरीदा। यहीं पर मैंने अपने मामा को फोन लगाया जो यहीं सरकारी हाॅस्पिटल में डॉक्टर हैं और नाना भी यहीं रहते थे जो सीबीआई से रिटायर हाेकर यहीं बस गए। उनसे बात ही नहीं हो सकी और उनका घर भी विपरीत दिशा में था इसलिए वहां न जाकर आगे हवा महल चला गया। 





यहां पर मेट्रो रेल चलने लगी थी। इससे पहले 12 साल पहले जयपुर आया था। तब से काफी बदल चुका था जयपुर शहर। साढ़े 8 बजे शहर पार करने के बाद हवा महल पहुंचा। यहां कुछ कपड़ों की खरीदारी की और आधा घंटा यहां बिताने के बाद 9 बजे जयपुर से चल दिया। अब अगली मंजिल थी यहां से 125 किमी दूर अजमेर। मुझे अजमेर रात में ही पहुंचना था। 

जयपुर मेट्रो ट्रेन।

गुलाबी नगरी, जयपुर।

जयपुर शहर।


हवा महल।

हवा महल, जयपुर।
यहां से जयपुर-अजमेर हाइवे पर पहुंचा। रास्ते में थोड़ी देर के लिए एक होटल पर खाने के लिए रुका। भूख ज्यादा नहीं थी इसलिए सिर्फ चाय पीकर आगे चल दिया। 

राजमंदिर सिनेमा।

जयपुर-अजमेर हाइवे के इस होटल पर किया रेस्ट।

चाय की तलब।

जब हाइवे पर 110 की स्पीड पर चली 100 सीसी की बाइक
इस हाइवे पर मैंने अभी तक की सबसे तेज ड्राइविंग की। 100 से 110 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से टीवीएस बाइक को दौड़ाया। रात होने की वजह से सड़कें सुनसान पड़ी थी। 125 किमी की दूरी मात्र डेढ़ घंटे में तय की। एवरेज स्पीड थी 80 किमी प्रति घंटा। इससे पहले इतनी तेज गाड़ी मैंने भोपाल से गुजरात के सफर पर चलाई थी। गुजरात के मांडवी से भुज के बीच की रात में 65 किमी की दूरी 50 मिनट में तय की थी। कोई ब्रेक नहीं और 90 की स्पीड। 

पुलिसकर्मी बोले-हमें तो बैग में स्मैक नजर आ रही है
साढ़े 11 बजे अजमेर शहर पहुंच गया। शहर में प्रवेश करने से पहले ही कुछ पुलिसकर्मियों ने मेरी गाड़ी रोक ली। उन्होंने पूछा कि कहां से आ रहे हो तो मैंने कहा कि भोपाल से। वह बोले के बावले हो गए हो कि, बाइक से भोपाल से चले आ रहे हो। बैग में क्या है? मैंने कहा कि कपड़े और कुछ जरुरी सामान है। वह बोला कि हमें तो इसमें स्मैक नजर आ रही है। बैग के अंदर नशे का सामान तो नहीं भरा। मैंने कहा कि खोलकर देख लो और अपना परिचय दिया। उसके बाद भी वह थोड़ा ठंडा हुआ। बैग तो उसने खोलकर नहीं देखा। फिर उसने शहर के अंदर जाने दिया और पूछा कि अब कहां जाकर ठहरोगे तो मैंने कहा कि जैसे आपने रोककर शहर के बारे में बताया है, वैसे ही कोई और भी मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचा देगा। पुलिसकर्मी हंस कर रह गया। 

अजमेर। खाना खाने के बाद पौने 1 बजे वापस लॉज लौट कर आया।
थोड़ा सा आगे चला तो एक ऑटो वाला आ गया। उसने मुझे रेलवे स्टेशन के पास एक लॉज में ठहरा दिया। कमरा 500 रुपए में मिल गया। वहीं सामान रखकर फिर खाना खाने के लिए गया। रात को पौने एक बजे वापस आकर सो गया। सुबह जल्दी उठकर पुष्कर जो जाना था।  इस तरह आज 506 किलोमीटर की दूरी बाइक से तय की। 



आगे की यात्रा अगले लेख में....



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-PART-13  कुरुक्षेत्र से पानीपत तक का सफर:यहां चाय वाला रखता है 45 हजार का मोबाइल, पानीपत की युद्ध भूमि का बना साक्षी



-PART-11 देहरादून से कालसी होते हुए पावंटा साहिब तक का सफर: सम्राट अशोक के कालसी शिलालेख में है राजा और प्रजा का रिलेशन, गुरु गोविंद सिंह से जुड़ा हैं पावंटा साहिब

-PART-10 शिवपुरी (उत्तराखंड) से देहरादून का सफर: जंगल कैंप और रिवर राफ्टिंग का रोमांचक अहसास, भगवान शिव ने पिया था यहीं विष का प्याला