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Saturday, July 16, 2022

34 द‍िन में 8540 KM का बाइक से अकेले सफर, पूर्वोत्‍तर को जानने का म‍िला अवसर  

नई द‍िल्‍ली: 6 सालों में 25 हजार क‍िलोमीटर का सफर तय करके भारत के अनछुए पहलुओं को लोगों के सामने लेकर आने के बाद सातवीं ट्र‍िप में कुछ बड़ा ही धमाका हुआ. 100 सीसी की टीवीएस स्‍पोर्टस बाइक से सातवीं बार में 8540 क‍िमी का सफर तय कर डाला, वह भी मात्र 34 द‍िन में. चूंक‍ि इतने द‍िन की छुट्टी क‍िसी भी संस्‍थान में म‍िलना मुश्‍क‍िल थी, इसल‍िए मीड‍िया की नौकरी को भी कुछ समय के ल‍िए बाय-बाय कहना पड़ा. 

नगालैंंड की जमीन पर भोपाल से गई बाइक.  

बाइक से सातवीं यात्रा पूर्वोत्‍तर भारत की थी जो 7 अप्रैल 2022 को भोपाल से शुरू हुई थी और 10 मई को भोपाल में ही खत्‍म हुई थी. इस दौरान भारत के 14 राज्‍यों और देश की राजधानी द‍िल्‍ली से गुजरना हुआ. 

मेघालय के चेरापूंंजी में बादलों के बीच से गुजरने का अनुभव. 

इस यात्रा का न‍िर्णय भी अचानक हुआ था. स‍िर्फ एक द‍िन पहले ही प्‍लान हुआ था क‍ि नॉर्थ ईस्‍ट की यात्रा करनी है. इस यात्रा को करते ही भारत के सभी 28 राज्‍यों को कवर करने का सपना पूरा होने वाला था. 10 साल पुरानी 100 सीसी बाइक से पूर्वोत्‍तर के पहाड़ों में जाना वाकई में अपने आप में चुनौती थी लेक‍िन उस चुनौती को भी सफलतापूर्वक पूरा क‍िया. इस सफर में कुल 40 हजार रुपये का खर्चा आया, उसमें भी कई लोगों ने आगे बढ़कर मदद की. इस खर्चे में बाइक का पेट्रोल, रहना, खाना, टूर‍िस्‍ट प्‍लेस की ट‍िकट शाम‍िल हैं. 

मेघालय में झरनों के बीच.

अब इसी यात्रा को शब्‍दों में प‍िरोने का काम शुरू हो रहा है. यह यात्रा 34 द‍िनों में हुई तो कोश‍िश है क‍ि इसे 34 ब्‍लॉग में पूरा ल‍िख दें. इस यात्रा में रोमांच तो है ही, साथ ही यात्रा के बाद जो हुआ, वह भी आम इंसान को समझने की जरूरत है.  

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Monday, August 5, 2019

Friendship With History: एक शाप से उजड़ गया था यह शानदार किला, तुगलकी फरमान का था गवाह

कहा जाता है कि देश की राजधानी दिल्ली 7 बार उजड़ी और बसी। हालांकि बताने वाले तो कहते हैं कि दिल्ली सात बार नहीं बल्कि 16 बार बसी और उजड़ी लेकिन इस बात के अभी तक प्रमाण नहीं हैं। खैर, कोई बात नहीं, हमने इस बार के फ्रेंडशिप डे को कुछ अलग तरह से मनाने की सोची और इस बार दोस्त बनाया अपने इतिहास को।




फेसबुक पर इवेंट पेज पर जानकारी लगी कि रविवार 4 अगस्त को 'सैर-ए-दिल्ली' पेज पर एक इवेंट की जानकारी है जिसमें तुगलकाबाद हेरिटेज वॉक की जानकारी दी गई थी। तुगलकों  के बारे में इतिहास में पढ़ रखा था कि इसी वंश के एक सुल्तान का नाम सनकी सुल्तान के रूप में इतिहास में  दर्ज है। यही एक चीज थी जिसने वहां जाने के लिए मजबूर कर दिया। 

हेरिटेज वॉक का समय सुबह 8 से 11 का था। खैर, सुबह साढ़े पांच उठे और सुबह 6.30 बजे की 34 ए नंबर की बस नोएडा सेक्टर 19 से पकड़ी। बस का 50 रुपये में पास बनवा लिया तो आराम से अब पूरे दिन दिल्ली में कहीं भी घूमने का इंतजाम हो गया। बस से पहुंचना तो 8 बजे तक था लेकिन सुबह खाली रास्तों को कारण सवा 7 बजे हम स्पॉट पर थे। अब वहां 25 रुपये का टिकट लिया और अन्य साथियों का इंतजार करने लगे। ठीक 8 बजे वहां फरीदाबाद, गुड़गांव और दिल्ली से आए करीब 50 साथी थे जो इस हेरिटेज वॉक का हिस्सा बनने वाले थे। 


किले के अंदर पहुंचकर सबका परिचय हुआ। इस किले के बारे में रोचक जानकारी देने के लिए यूसुफ भाई थे जो दिल्ली में बसे सातों शहरों की कई बार हेरिटेज वॉक करा चुके थे। इस किले और 14वीं शताब्दी में बसी तीसरी दिल्ली के बारे में उन्होंने तारीख ए फिरोजशाही और रिहाला किताब से जानकारी जुटाई थी। 

परिचय के बाद यूसुफ ने ट्रैकर्स को दिल्ली में बसे सातों शहरों के बारे में जमीन पर मैप बनाकर जानकारी देना शुरू की। तब पता चला कि हम जिस किले में खड़े थे, वह तीसरी बार बसी दिल्ली थी जिसे तुगलक वंश के ग्यासुद्दीन तुगलक ने 1320 से 1325 ईसवी के बीच बसाया था। इसने ही खिलजी वंश के बाद तुगलक वंश चलाया था। जब हमें कोई फरमान अजीब लगता है तो कहते हैं कि यह तुगलकी फरमान है। यह शब्द इसी तुगलक वंश की ईजाद है जिसे चरम पर ग्यासदुद्दीन तुगलक के बेटे मोहम्मद बिन तुगलक ने पहुंचाया।



आज के हमारे गाइड ने यहीं बताया कि ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक, सबसे पहली दिल्ली महरौली-लालकोट, दूसरी सीरी, तीसरी तुगलकाबाद, चौथी, जहांपनाह, पांचवी  फिरोजाबाद, छठवीं दीनपनाह और सातवीं शाहजहानांबाद है। जिसे हम पुरानी दिल्ली कहते हैं वह सबसे नई बसी हुई दिल्ली है। 


किले पर देखने लायक कई जगह थी जो इतिहास को हमारे सामने जीवंत कर रही थीं। एक शानदार बावली थी जिसमें सीढ़ियों से नीचे उतरने का रास्ता था। इस बावली के नीचे जो चट्टान नजर आ रही थी, वह अरावली पर्वतमाला का हिस्सा थी।


इसके बाद थोड़ा सा आगे चले तो एक घुमावदार दरवाजे के सामने सभी रुक गए। इस किले में प्रवेश करने के ऐसे 13 दरवाजे थे। इनका घुमावदार रास्ता इसलिए था कि दुश्मन के आक्रमण के समय सभी सचेत हो जाएं।

इसके आगे भी कुछ जगह थी जहां अन्न का भंडार करके रखा जाता था लेकिन वहां जाने का समय नहीं था। इसके बाद वहां सुल्तान के महल के भी भग्नावेष नजर आए जो एक समय दुनिया का श्रेष्ठ महल था। यह किला साढ़े 6 किलोमीटर में फैला था लेकिन अब 2 किलोमीटर का ही हिस्सा बचा हुआ है। 


किले में ही एक ऐसी जगह थी जो थोड़ा जमीन के नीचे थी और कई कोठरियां बनी थी। गाइड ने बताया कि यह शायद कैदियों को रखने की जगह या मीना बाजार था। इसमें चलना भी एक रोमांच की तरह था। 


किले में दूर तक नजर रखने के लिए चारों दिशाओं में चार वॉच टॉवर भी बनाए गए थे। इसके अलावा यहां एक और गहरी बावली नजर आई जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियां नहीं थीं। गाइड ने बताया कि इसे विजय मा जगह कहा जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि मौत की सजा पाए कैदियों को इसमें फेंक दिया जाता था। बावली में बड़े-बड़े मगरमच्छ थे जो नीचे फेंके गए कैदियों को खा जाते थे। 


इस किले से कुछ शाप भी जुड़े थे इसलिए उस समय का दुनिया का यह भव्यतम किला कुछ ही सालों में वीरान हो गया। इसके बारे में भी एक रोचक कहानी है। कहा जाता है कि ग्यासुद्दीन तुगलक ने किले को बनवाने के लिए दिल्ली की सारी जनता को मजदूर के रूप में लगा दिया। प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने उनके फरमान को मानने से इनकार किया तो सुल्तान ने उन्हें सजा देनी चाही। तब औलिया ने शाप दिया कि जिस किले का तुम्हें इतना घमंड है वह वीरान हो जाएगा। यह किला आधा उजड़ा और आधा गूजरों के कब्जे में चला जाएगा। 



निजामुद्दीन औलिया ने एक और शाप ग्यासुद्दीन तुगलक को दिया था। बंगाल विजय से लौटते समय सुल्तान ने अपने बेटे जौना खान को कहा कि मेरे दिल्ली आने से पहले निजामुद्दीन औलिया से कहो कि वह दिल्ली छोड़कर कहीं चले जाएं नहीं तो हम उसे छोड़ेंगे नहीं। तब औलिया साहब ने कहा कि अभी तो दिल्ली दूर है। उनकी बात सच साबित हुई। इलाहाबाद के पास कड़ा नाम की जगह पर जौना खां ने अपने पिता का सम्मान करने के लिए एक बड़ा शामियाना लगाया। जब उस पर हाथी चले तो वह ढह गया जिसमें ग्यासुद्दीन तुगलक की मौत हो गई। उसके बाद दिल्ली के तख्त पर मोहम्मद बिन तुगलक बैठा जिसने 1325 से 1351 ईसवी तक दिल्ली सल्तनत पर शासन किया।



किले के सामने दूसरे हिस्से में ही ग्यासुद्दीन तुगलक, उनकी पत्नी और उनके बेटे मोहम्मद बिन तुगलक की कब्र बनी हुई है। तुगलक वंश के ही फिरोजशाह तुगलक की कब्र हौज खास किले में बनी हुई है। 



यह सब देखने में 11 बजे चुके थे। अब वहां से निकले तो तुगलकाबाद गांव के रास्ते पर पहुंचे। यहीं 20 रुपये की शानदार बिरयानी और 20 रुपये की आलू टिक्की खाकर पेट पूजा की और फिर 34 नंबर की ही बस पकड़कर वापस अपने ठिकाने नोएडा सेक्टर 19 ए में 2 बजे तक लौटकर आए। 


इस तरह 200 रुपये हे्रिटेज वॉक का चार्ज, 25 रुपये का टिकट, 75 रुपये का खाना-पीना, 50 रुपये बस का किराया लगा। इस तरह 350 रुपये में सात में से एक दिल्ली को देखने का अनुभव लिया।  

Shyam Sundar Goyal
Journalist
Delhi

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Sunday, January 6, 2019

स्कूबा डाइविंग में ऑक्सीजन खत्म, 10 सेकंड में होने वाली थी मौत लेकिन...

6 सालों में भारत (Solo India Trip on Bike) के 20 राज्यों में 23,500 किलोमीटर की बाइक से यात्रा के दौरान कुछ ऐसे पल भी आए जब सीधे मौत ने दस्तक दे दी। कुछ ही सेकंड ही आप मरने वाले हों और फिर उस स्थिति से बाहर आना। ऐसी ही एक घटना 28 मार्च 2017 को महाराष्ट्र के मालवण तट पर स्कूबा डाइविंग के दौरान घटी जिसके पास समुद्री सिंधुदुर्ग किला है।

प्रतीकात्मक फोटो
ये सफर नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए
आग का दरिया है और तैर कर पार करना है...

कुछ इसी तरह के अनुभव भारत यात्रा (Journey of India) में हुए हैं। आज मैं आपको बताने जा रहा हूं 28 मार्च 2017 की उस घटना के बारे में जब मैं साउथ इंडिया (Journey of South India) की 7214 किमी की यात्रा पर था।गोवा (Journey of Goa) से लौटते हुए समुद्री किले सिंधुदुर्ग को देखने की इच्छा हुई। सिंधुदुर्ग किला (Sindhudurg Fort)  महाराष्ट्र के मालवण तट पर है। मालवण से वहां जाने लिए स्टीमर चलते हैं।


मैं मालवण गया तो था किला देखने लेकिन वहां जब देखा कि 800 रुपए में स्कूबा डाइविंग हो रही है तो मैंने पहले स्कूबा डाइविंग (5 best places to go scuba diving in India) की सोची, उसके बाद किला घूमने की। अपनी बाइक (Bike Trip)  वहीं किनारे खड़े की और काउंटर पर जाकर 800 रुपए की रसीद कटाई। उस स्टीमर पर और भी लोग सवार थे जो स्कूबा डाइविंग के लिए ही बैठे थे।



मेरे समुद्र में उतरने से पहले तीन लोग स्कूबा डाइविंग करके आ चुके थे। उनके समंदर की तलहटी में रंगीन मछलियों और चट्टानों के साथ बेहतरीन फोटो आए थे। समंदर के अंदर वीडियो और फोटोग्राफी टिकट में ही शामिल थी।

मेरा भी नंबर आया तो कमर में लोहे का भारी बेल्ट बांध दिया गया। पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर और नाक को मास्क से पैक कर दिया गया। अब सिर्फ मुंह से सांस लेनी और छोड़नी थी। मुझे तैरना नहीं आता था लेकिन स्कूबा डाइविंग में ये कोई बाधा नहीं थी। 5 मिनट की प्रैक्टिस के बाद पहली बार गहरे समंदर में उतर गया। मैंने स्टीमर के पास ही गोता लगा लिया और पानी के नीचे गोता लगाने लगा।

\महाराष्ट्र के मालवण में सिंधुदुर्ग समुद्री किले के पास स्कूबा डाइविंग Scuba diving.
पहले तो सामने धुंधला पानी दिखा लेकिन जैसे ही तलहटी पर पहुंचा तो दुनिया ही बदल गई। आसपास ढेर सारी रंगीन मछलियां और साफ पानी। ऐसा लगा कि स्वर्ग में आ गए। सामने इंस्ट्रक्टर फोटो खींचने के लिए कैमरा सेट करने लगा। मैं भी एक समुद्री चट्टान पकड़कर इस बेहतरीन पल को एन्जॉय कर रहा था कि अचानक सबकुछ बदलने लगा।

मुझे अचानक लगा कि जैसे ऑक्सीजन खत्म हो गई। सांस लेने में तकलीफ होने लगी। ऊपर से समंदर के पानी का प्रेशर। मुझे लगा कि शायद मुंह से आक्सीजन की नॉब निकल गई है। मैंने उसे बाहर निकालकर फिर से आक्सीजन अंदर खींची तो समंदर का नमकीन पानी फुल प्रेशर से मुंह के अंदर घुस गया और सीधा दिमाग पर अटैक करने लगा। कानों के अंदर ऐसा लगने लगा जैसे वे फट जाएंगे।

फिर नॉब बाहर निकाली और सांस खींची, तब भी वही स्थिति। सिर्फ 5 सेकंड में ऐसा लगा कि कुछ ही सेकंड में मौत होने वाली है। सामने मेरे इंस्ट्रक्टर थे लेकिन उसे कुछ कह नहीं पा रहा था और न ही उस समय वह इशारा याद आ रहा था जो खतरे के समय करने से इंस्ट्रक्टर मुझे बचा सकता था। दिमाग धीरे-धीरे शून्य होने लगा।



ऐसे में मेरी विल पॉवर (Will Power)  काम में आई। मैंने तुरंत फैसला लिया कि अभी मुझे ही कुछ करना पड़ेगा लेकिन क्या, ये समझने में मैंने ज्यादा देर नहीं की। मुझे ये भी नहीं पता था कि मैं समंदर में कितनी गहराई पर हूं, लेकिन फैसला किया तलहटी में मरने से अच्छा है कुछ प्रयास करके मरना... और मैंने सीधा ऊपर की तरफ उठना शुरू कर दिया। 10 सेकंड में तेजी से ऊपर चढ़ते हुए सतह की तरफ बढ़ने लगा और जब ऊपर आया तो पेट के अंदर खारा पानी भर चुका था।

इंस्ट्रक्टर ने ऊपर पूछा कि क्या हुआ था। फोटो नहीं खिंच पाए हैं फिर से नीचे जाना पड़ेगा लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं बची थी। जल्दी से बोट पर आया और पेट से पानी निकाला। करीब आधा घंटे बाद दिमाग कुछ सोचने-समझने लायक हो पाया। खारे पानी ने सबसे पहले दिमाग पर ही अटैक किया था जिससे आपके निर्णय की क्षमता खत्म हो जाती है। समंदर में फोटो न खिंचने का मलाल रहा लेकिन ये भी सत्य था कि इसी समंदर में मेरी कब्र भी बन सकती थी। खैर कोई बात नहीं, उसके बाद आगे की यात्रा पर चल दिए...

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Friday, September 21, 2018

भिखारी पॉलिटिक्स का गजबिया ज्ञान #4 #Amazingindia

अभी हाल में बहुजन समाज पार्टी की लीडर मायावती  ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को धता बनाकर पूर्व कांग्रेसी लीडर अजीत जोगी की जनता कांग्रेस से गठबंधन कर लिया है। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि एक राष्ट्रीय पार्टी जब बीएसपी के दरवाजे पर दस्तक दे रही हो तब एक अनाम से क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन कुछ हजम नहीं होता, लेकिन ऐसा हुआ।

हाल ही में 6 राज्यों में 4500 किमी बाइक से छत्तीसगढ़ के दूर-दराज के क्षेत्रों में घूमकर जाना कि छत्तीसगढ़, कैसे दूसरे राज्यों से अलग है, वहां जमीनी स्तर पर लोग कैसे रहते हैं, इन सब सवालों के जवाब एक भिखारी के माध्यम से आर्टिकल में देने की कोशिश की गई है...


13 अगस्त 2018 शाम 6 से रात 7 बजे तक...छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाने वाला कवर्धा जिले में भोरमदेव टेंपल का रास्ता

भोपाल से 12 अगस्त को बाइक से निकला और 13 अगस्त की शाम को भोरमदेव टेंपल पहुंचा। भोरमदेव के मंदिर के चारों तरफ खजुराहो जैसी ही कामुक प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गईं हैं। यहां उस समय सावन का मेला चल रहा था। मंदिर को देखने के बाद जब रायपुर के लिए निकला तो अंधा भिखारी लिफ्ट लेने के लिए खड़ा था। मैं तो वैसे भी रास्ते में लिफ्ट देकर ही चलता हूं जिससे की लोकल के लोगों से बातचीत होती रहे। उसके साथ बेटी भी थी जो उसे रास्ता दिखाती थी। वह दोनों बाइक पर बैठ गए और शुरू हुई बातचीत..


इस भिखारी की बातें सुनकर पॉलिटिक्स के धुरंधरों की आखें खुल जाएंगी।
-कहां चलना है?
भिखारी-आगे 15 किमी की दूरी पर मेरा घर है, मुझे वहां तक छोड़ृ दें। मंदिर के प्रसाद के 8 किलो चावल मिले थे, उन्हें मैंने किसी और के हाथों घर भेज दिया है।
-यहां क्या रोज आते हो?
भिखारी-नहीं,बस सावन के महीने में 8 दिन मेला लगता है, उसी समय भीख के लिए आता हूं। यहां चावल चढ़ाया जाता है, उसी से काम चल जाता है?
-बाकी समय?
भिखारी-बाकी समय कुछ नहीं, बस घर पर पड़े रहते हैं।
-फिर घर कैसे चलता है?
भिखारी-रमन सिंह हर महीने चावल, कैरोसीन दे देता है। उससे घर चल जाता है।
-बाकी की जरूरतें कैसे पूरी होती हैं?
भिखारी-जब कुछ जरूरत होती है तो उनके घर चला जाता हूं। उनके बेटे अभिषेक से बात करता हूं तो कुछ मदद मिल जाती है।
-बच्चों की पढ़ाई?
भिखारी-स्कूल से ही कॉपी-किताब, ड्रेस मिलती हैं। स्कॉलरशिप भी मिलती है तो इससे काम चल जाता है। अब तो बस आवास चाहिए, उसका भी वादा किया हुआ है। अभी चुनाव आने वाले हैं, उनके घर जाकर फिर मिलता हूं। उनसे कहूंगा कि आवास दे दो तो इस बार भी तुम ही जीतोगे।
-अगर आवास नहीं दिया तो?
भिखारी-तो फिर कैसे जीतेगा, हमारे आशीर्वाद से ही तो उसे जीत मिलती है, हार नहीं जाएगा।
-वह तुम्हें आवास क्यों देगा?
भिखारी- क्योंकि उसका काम है देना।
-और तुम्हारा?
भिखारी-(इस बार जवाब देने से पहले वह कुछ देर रुका फिर बोला) हमारा काम है लेना....



(6 सालों में 23,500 किमी की दूरी तय कर 20 राज्यों में मोटरसाइकिल से भारत भ्रमण करने के बाद 'Amazingindia' सीरिज के तहत ये ऑरिजनल कंटेंट है। इसका किसी भी तरह से उपयोग करने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत कार्रवाई करने का सर्वाधिकार सुरक्षित)  

Saturday, September 15, 2018

आखिर क्यों नहीं पहनतीं यहां महिलाएं ब्लॉउज #3 #Amazingindia

भोपाल. 22 सितंबर को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओडिशा में एयरपोर्ट, रेल लाइन और माइनिंग से रिलेटेड इश्यूज के लिए ओडिशा जाने वाले हैं। ये एक ऐसा राज्य है जहां एक तरफ आधुनिकता के दर्शन होते हैं तो वहीं गरीबी के लिए भी ये दुनिया में बदनाम है। आखिर क्या है ओडिशा का सच? 
 

ओडिशा में चिल्का क्षेत्र की महिला बिना ब्लॉउज के सिर्फ साड़ी में ही। 
हाल ही में 6 राज्यों में 4500 किमी बाइक से ओडिशा के दूर-दराज के क्षेत्रों में घूमकर जाना कि ओडिशा, कैसे दूसरे राज्यों से अलग है, वहां जमीनी स्तर पर लोग कैसे रहते हैं, उनके लिए विदेश क्या है? आखिर वहां कई इलाकों की महिलाएं ब्लॉउज क्यों नहीं पहनतीं? इन सब सवालों के जवाब इस आर्टिकल में देने की कोशिश की गई है...

14 अगस्त 2018 रात 7 बजकर 50 मिनट से 17 अगस्त रात 9 बजे तक...ओडिशा में 1000 किमी की बाइक राइडिंग...यहां असका से हुम्मा के बीच की स्टोरी...हुम्मा से सिर्फ 6 किमी दूर ही पदमपेट में वर्ल्ड फेमस ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं का प्रजनन स्थल है

ओडिशा में पदमपुर कस्बे में प्रवेश करने के बाद एक चीज मुझे बार-बार चौंका रही थी। बरसात में यहां धान की खेती में महिलाएं काम कर रही थी लेकिन अपने शरीर को सिर्फ साड़ी से ही ढकें हुई थीं। पहले मैंने सोचा कि शायद ये कोई प्रथा होगी और कुछ विशेष इलाकों और बड़ी उम्र की महिलओं में ही ऐसा होता होगा लेकिन यहां तो ऐसा कुछ नहीं था। सभी उम्र की महिलाएं कई इलाकों में बिना ब्लॉउज के ही दिखीं।
असका से हुम्मा के बीच केे खेत। ओडिशा में मध्यप्रदेश से मेरी बाइक।

इस वजह से नहीं पहन पाती महिलाएं ब्लॉउज
असका से हुम्मा जाने के बीच एक जगह महिलाएं खेतों में काम कर रही थीं तो वहीं सड़क से गुजरते एक शख्स से आखिर पूछ ही लिया कि यहां ऐसा क्यों हैं? तब उसने जवाब दिया कि ये कोई प्रथा के कारण नहीं हैं। यहां गरीबी का बोल-बाला है। ये सभी महिलाएं सुबह 6 बजे से आईं है और दोपहर 12 बजे तक काम करेंगीं तब उन्हें 120 रुपए दिए जाएंगें। यदि पूरे दिन काम करेंगी तो 240 रुपए। साल के सिर्फ 2 महीने ही धान की खेती के समय इन्हें काम मिलता है, बाकी समय यहां कोई फसल नहीं होती। इसी पैसे से गुजारा करना पड़ता है। सदियों से ऐसा ही चल रहा है। अब जब पैसे ही नहीं होंगे तो वह कैसे कपड़ों पर खर्च करेंगी। यही कारण है कि एक साड़ी में ये पूरा जीवन गुजार देती हैं। बाकी के समय इन्हें 'विदेश' जाकर काम करना होता है? जब उनसे पूछा कि विदेश मतलब क्या तो उसने जवाब दिया कि आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र में जाकर काम करने को ही यहां विदेश माना जाता है।
साल में सिर्फ 2 महीने काम, मजदूरी सिर्फ 120 रुपए 
(6 सालों में 23,500 किमी की दूरी तय कर 20 राज्यों में मोटरसाइकिल से भारत भ्रमण करने के बाद 'Amazingindia' सीरिज के तहत ये ऑरिजनल कंटेंट है। इसका किसी भी तरह से उपयोग करने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत कार्रवाई करने का सर्वाधिकार सुरक्षित)