Sunday, February 3, 2019

दिल्ली को क्यों कहते हैं दगाबाज शहर? महाभारत और पानीपत में छिपा है इसका राज

अक्सर दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां के लोगों में भावना नहीं है। कौन अपना है और कौन पराया, इसका भेद कभी किसी को नहीं लग पाता। भारत जैसे विशाल देश में जहां विभिन्नताओं की भरमार है, वहां की राजधानी में रहने वाले लोगों की सोच ऐसी क्यों है? क्या वह ऐसा करना चाहते हैं या इस दिल्ली की जमीन में ही ऐसा कुछ है कि यहां आकर लोग भी ऐसे हो जाते हैं। 



इस बारे में देश भर की यात्रा और विश्वास पाटील की किताब पानीपत पढ़कर ऐसा लगा कि सही मायने में दिल्ली को समझना है, तो इस किताब को पढ़ना पढ़ेगा, महाभारत के बारे में तो सब जानते ही हैं। इन सबको मिलाकर जो निष्कर्ष निकला, उसका निचोड़ है कि दिल्ली की जमीन ही ऐसी है जो अपनो को दगा करने पर मजबूर करती है। कैसे, आइये देखते हैं...

पानीपत किताब में एक प्रसंग आता है कि मराठा सेना, अहमदशाह अब्दाली से युद्ध करने 14 जनवरी 1761 से कई महीने पहले ही पानीपत के मैदान में डटी थी। अब्दाली ने दिल्ली से मराठों की कनेक्टिविटी काट दी थी, इसलिए उन्हें खाने और अन्य सुविधाओं के लिए स्थानीय लोगों पर निर्भर रहना पड़ता था। दिल्ली के लाल किले पर उस समय मराठों का ध्वज फहराता था, मुगल बादशाह सिर्फ नाम के बादशाह रह गए थे। 

ऐसे में एक दिन मराठों के पेशवा सदाशिवराव भाऊ पानीपत में अपनी रसद के लिए व्यवस्था कर रहे थे तो एक स्थानीय व्यक्ति से उलझ गए। उस व्यक्ति ने भाऊ को ललकारते हुए कहा कि तुम्हें किस चीज का गुमान है। जिस भूमि पर आप खड़े हो, वह दगाबाज जमीन है। इसने अपनों को कभी नहीं बख्शा है, और यह सच साबित हुआ। मराठों को स्थानीय स्तर पर कोई सहायता नहीं मिली। 14 जनवरी 1761 को मकर संक्राति के आधे दिन में ही मराठा साम्राज्य का सूरज सदा के लिए डूब गया। महाराष्ट्र में ऐसा कोई घर नहीं था, जिसका कोई सगा नहीं मरा था। 
यहीं हुआ था पानीपत का मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच 1761 में तीसरा युद्ध 
फिर मुझे लगा कि आखिर क्या है इस जमीन में क्या है जो यहां के साम्राज्य, पलों में बिखर जाते हैं और लोग अपनों से चोट खाते हैं। तब मैं थोड़ा समय के पीछे गया तो समझ में आया कि पानीपत, कुरुक्षेत्र, दिल्ली उस युद्ध भूमि के भाग थे जहां महाभारत का युद्ध् लड़ा गया था। कुरुक्षेत्र की मुख्य भूमि के आसपास 48 कोस यानि 156 किलोमीटर के दायरे में ये युद्ध हुआ था जिसमें दिल्ली भी आती है। दिल्ली की कुरुक्षेत्र से दूरी 155 किलोमीटर है। 18 दिनों में यह श्मशान भूमि बन गई थी। 

इसी वृक्ष के नीचे कृष्ण ने दिया था अर्जुन को गीता का ज्ञान, बोर्ड पर लिखा है कि महाभारत का युद्ध ़156 किलोमीटर तक हुआ था। 
तब भी भारत का कोई भी भाग ऐसा नहीं था, जब किसी घर में मौत नहीं हुई थी। यहां भी हस्तिनापुर के कौरवों के शक्तिशाली साम्राज्य को, पांडवों के हाथों खोना पड़ा था। अपनों ने ही अपनों से दगा का इतिहास यहां पर लिखा था। शायद तब से अब तक यही कहानी चली आ रही है। जो सबसे शक्तिशाली होता है, वही यहां धराशायी होता है। यह आज भी हो रहा है। हर रोज यहां लोग कहते हैं कि हमने उस पर भरोसा किया लेकिन उसने दगा किया। यहां तक कि बाहर से भी जो लोग यहां आते हैं, उनका व्यवहार भी यहीं के जैसा हो जाता है। 

महाभारत के युद्ध के बाद दिल्ली कई सालों तक राजधानी नहीं बनी। भारत का शासन मगध के पाटिलिपुत्र से चलता रहा। हर्षवर्धन के समय कन्नौज भारत की राजधानी रही। उसके बाद परमार और प्रतिहार काल में भी कन्नौज ही सत्ता का केंद्र था। दिल्ली को कई सालों बाद राजधानी का दर्जा दिया पृथ्वीराज चौहान ने। उसने अजमेर और दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। 1192 ईसवी में उसे मोहम्मद गौरी के हाथों बुरी तरह पराजय मिली और दगा किया उनके अपने ही भारतवासी कन्नौज के महाराज जयचंद ने।

उसके बाद दिल्ली में कई सल्तनतें एक झटके में खत्म हुईं और बनी। पानीपत का पहला युद्ध् बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच 1526 में हुआ। एक ही दिन में लोदी वंश का साम्राज्य खत्म हो गया और बाबर को जीत मिली। बाबर को भारत में आमंत्रण राणा सांगा ने दिया था। 

उसके बाद पानीपत का दूसरा युद्ध् 1556 में हुआ। उस समय दिल्ली पर हेमू का शासन था। 13 साल के अकबर ने हेमू को आसानी से हरा दिया। पानीपत का तीसरा युद्ध मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच 1761 में हुआ। इसमें भी सिर्फ एक दिन में इतिहास बदल गया। उसके बाद पानीपत में कोई युद्ध नहीं हुआ और न ही दिल्ली को फिर वैसा वैभव मिला। 

उसके बाद कलकत्ता से अंग्रेजों का शासन शुरू हो गया था। अंग्रेजों ने भी जब दिल्ली को 1911 में राजधानी बनाया तो यहां क्रांतियों का दौर शुरू हुआ। 15 अगस्त 1947 को एक दिन में ही अंग्रेजों का सूर्य अस्त हुआ और भारतीयों को सत्ता मिली। आज भी दिल्ली की वही तासीर है। इंदिरा गांधी का तब तख्ता पलटा, जब वह सबसे ताकतवर थीं। एनडीए की वाजपेयी सरकार केंद्र में तब हारी, जब वह सबसे मजबूत थी और वह भी अपनों की वजह से। यही हाल दिल्ली की सत्ता का रहा जहां एक नई नवेली आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का सूर्य ही अस्त कर दिया। अभी और भी बहुत कुछ देखना है दिल्ली को... 

अब हम भी इसी दिल्ली शहर में
तो दिल्ली में रहना है तो दिल्ली की तासीर को समझना होगा। क्योंकि यही दिल्ली है जो पूरे विश्व में लोगों को ख्याति दिलाती है, राजा को रंक और रंक को राजा बनाती है। फर्श से अर्श तक उठाने की ताकत भी दिल्ली में है और शासन का नैसर्गिक गुण तो दिल्ली में है ही। दिल्ली में रहने का मूलमंत्र है कि किसी पर विश्वास न करो, दगा झेलने को तैयार रहो और उसे सफलता की सीढ़ी बनाकर ऊंचाईयों को छुओ...क्योंकि भाई दिल्ली ऐसी ही है...

Shyam Sundar Goyal
Delhi

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Tuesday, January 15, 2019

महेंद्र सिंह #Dhoni को जब पब्लिक के पत्थरों से बचने के लिए बदलना पड़ा था घर

आज हर जगह क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की चर्चा हो रही है कि उसने क्रिकेट के खेल में जबरदस्त वापसी की है. हो भी क्यों नहीं, धोनी है ही ऐसी शख्सियत...अपनी बिहार-बंगाल की यात्रा के दौरान मुझे उसी रांची में जाने का मौका मिला जहां महेंद्र सिंह धोनी का घर है.

महेंद्र सिंह धोनी का रांची में रिंग रोड वाला 7 एकड़ में फैला आलीशान घर (Photo:Life on Travel)
छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार में बाइकिंग करने के बाद 21 अगस्त 2018 की रात 12 बजे रांची पहुंचा. वहां अपने एक साथी ओमप्रकाश सिंह के यहां रुका जो दैनिक भास्कर डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं और बिहार और झारखंड की खबरों पर पैनी निगाह रखते हैं. रात को भूखा ही सोना पड़ा क्योंकि तब तक वहां के सारे होटल बंद हो चुके थे.

रात को ही प्लान ही बना कि सुबह धोनी का घर देखने जाना है. उस समय रांची मेरे लिए सिर्फ इतना ही था. इसके लिए रात में भास्कर के सीनियर स्पोर्टस रिपोर्टर नईम जी को फोन लगाया जो धोनी की हर खबर रखते हैं लेकिन उनसे उस समय बात नहीं हो सकी. खेर कोई बात नहीं, सोचा सुबह चलकर वहीं से फोन लगा लेंगे.

सुबह 6 बजे सोकर हम दोनों उठ गए. सबसे पहले धोनी के पुराने हरमू रोड के घर पहुंचे जो अब खाली पड़ा है. वहां कोई नहीं रहता. धोनी यहां से करीब 12 किमी दूर एक फॉर्म हाउस पर आलीशान घर बनाकर रहते हैं. जब मैंने अपने साथी से पूछा कि शहर के बीच में ये घर खाली कर क्यों चले गए तो उसने जवाब दिया कि जब भी धोनी कोई मैच हारते थे पूरे शहर की पब्लिक इस घर पर पत्थर फेंकने लगती थी. फैन्स भी यहां पर काफी तादाद में आते थे.
महेंद्र सिंह धोनी का रांची में हरमू रोड वाला पुराना घर (Photo:Life on Travel)
उस घर को देखने के बाद अब धोनी के नए ठिकाने की तलाश की. रांची में रिंग रोड में धोनी का ये फार्म हाउस करीब 7 एकड़ में फैला हुआ है. लोगों से पूछ-पूछकर शहर के बाहर हाइवे पर पहुंचे. वहां देखा कि बिल्कुल सुनसान जगह पर घर बनाया है. अब यहां से कोई पत्थर कितनी ताकत से भी फेंक ले, घर के अंदर नहीं जा सकता.
हम जब वहां पहुंचे तो धोनी अंदर ही थे. वहां से हमने नईम जी को फोन लगाया कि शायद मुलाकात करवा दें लेकिन उस समय ऐसा न हो पाया. गार्ड को भी कन्वेंस करने की कोशिश की भाई इतनी दूर से उसी स्पोर्टस बाइक से यात्रा करके आए हैं जिसका तुम्हारे साहब ने कई सालों तक प्रचार किया है. लेकिन गार्ड तो गार्ड है, उसने कहा कि साहब किसी से नहीं मिलेंगे. वह अभी सोकर उठे हैं.

महेंद्र सिंह धोनी का रांची में रिंग रोड वाला 7 एकड़ में फैला आलीशान घर (Photo:Life on Travel)
अब अपने पास इतना समय तो था नहीं कि पूरे दिन फैन के रूप में इंतजार करते. वैसे भी क्रिकेट में कोई ज्यादा इंटरेस्ट तो था नहीं. वह तो महेंद्र सिंह धोनी फिल्म देखी, उसमें लाइफ के इतने उतार चढ़ाव देखे कि सहज ही उनसे मिलने का मन हुआ. नहीं तो, पूरे देश के भ्रमण में मैंने किसी वीआईपी से मिलने का प्लान ही नहीं बनाया. नहीं तो आधा समय तो इसी की प्लानिंग में निकल जाता. अपने लिए तो आम लोग ही वीआईपी थे जो सहज भाव से अपनेपन से मिल तो लेते हैं.

खैर, उसके बाद वहां से 1 घंटे बाद वापिस हो लिए और अगली मंजिल के लिए निकल दिए. ठीक 10 बजे रांची शहर को नमस्ते कर आगे की राह चल दिए.



Sunday, January 6, 2019

स्कूबा डाइविंग में ऑक्सीजन खत्म, 10 सेकंड में होने वाली थी मौत लेकिन...

6 सालों में भारत (Solo India Trip on Bike) के 20 राज्यों में 23,500 किलोमीटर की बाइक से यात्रा के दौरान कुछ ऐसे पल भी आए जब सीधे मौत ने दस्तक दे दी। कुछ ही सेकंड ही आप मरने वाले हों और फिर उस स्थिति से बाहर आना। ऐसी ही एक घटना 28 मार्च 2017 को महाराष्ट्र के मालवण तट पर स्कूबा डाइविंग के दौरान घटी जिसके पास समुद्री सिंधुदुर्ग किला है।

प्रतीकात्मक फोटो
ये सफर नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए
आग का दरिया है और तैर कर पार करना है...

कुछ इसी तरह के अनुभव भारत यात्रा (Journey of India) में हुए हैं। आज मैं आपको बताने जा रहा हूं 28 मार्च 2017 की उस घटना के बारे में जब मैं साउथ इंडिया (Journey of South India) की 7214 किमी की यात्रा पर था।गोवा (Journey of Goa) से लौटते हुए समुद्री किले सिंधुदुर्ग को देखने की इच्छा हुई। सिंधुदुर्ग किला (Sindhudurg Fort)  महाराष्ट्र के मालवण तट पर है। मालवण से वहां जाने लिए स्टीमर चलते हैं।


मैं मालवण गया तो था किला देखने लेकिन वहां जब देखा कि 800 रुपए में स्कूबा डाइविंग हो रही है तो मैंने पहले स्कूबा डाइविंग (5 best places to go scuba diving in India) की सोची, उसके बाद किला घूमने की। अपनी बाइक (Bike Trip)  वहीं किनारे खड़े की और काउंटर पर जाकर 800 रुपए की रसीद कटाई। उस स्टीमर पर और भी लोग सवार थे जो स्कूबा डाइविंग के लिए ही बैठे थे।



मेरे समुद्र में उतरने से पहले तीन लोग स्कूबा डाइविंग करके आ चुके थे। उनके समंदर की तलहटी में रंगीन मछलियों और चट्टानों के साथ बेहतरीन फोटो आए थे। समंदर के अंदर वीडियो और फोटोग्राफी टिकट में ही शामिल थी।

मेरा भी नंबर आया तो कमर में लोहे का भारी बेल्ट बांध दिया गया। पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर और नाक को मास्क से पैक कर दिया गया। अब सिर्फ मुंह से सांस लेनी और छोड़नी थी। मुझे तैरना नहीं आता था लेकिन स्कूबा डाइविंग में ये कोई बाधा नहीं थी। 5 मिनट की प्रैक्टिस के बाद पहली बार गहरे समंदर में उतर गया। मैंने स्टीमर के पास ही गोता लगा लिया और पानी के नीचे गोता लगाने लगा।

\महाराष्ट्र के मालवण में सिंधुदुर्ग समुद्री किले के पास स्कूबा डाइविंग Scuba diving.
पहले तो सामने धुंधला पानी दिखा लेकिन जैसे ही तलहटी पर पहुंचा तो दुनिया ही बदल गई। आसपास ढेर सारी रंगीन मछलियां और साफ पानी। ऐसा लगा कि स्वर्ग में आ गए। सामने इंस्ट्रक्टर फोटो खींचने के लिए कैमरा सेट करने लगा। मैं भी एक समुद्री चट्टान पकड़कर इस बेहतरीन पल को एन्जॉय कर रहा था कि अचानक सबकुछ बदलने लगा।

मुझे अचानक लगा कि जैसे ऑक्सीजन खत्म हो गई। सांस लेने में तकलीफ होने लगी। ऊपर से समंदर के पानी का प्रेशर। मुझे लगा कि शायद मुंह से आक्सीजन की नॉब निकल गई है। मैंने उसे बाहर निकालकर फिर से आक्सीजन अंदर खींची तो समंदर का नमकीन पानी फुल प्रेशर से मुंह के अंदर घुस गया और सीधा दिमाग पर अटैक करने लगा। कानों के अंदर ऐसा लगने लगा जैसे वे फट जाएंगे।

फिर नॉब बाहर निकाली और सांस खींची, तब भी वही स्थिति। सिर्फ 5 सेकंड में ऐसा लगा कि कुछ ही सेकंड में मौत होने वाली है। सामने मेरे इंस्ट्रक्टर थे लेकिन उसे कुछ कह नहीं पा रहा था और न ही उस समय वह इशारा याद आ रहा था जो खतरे के समय करने से इंस्ट्रक्टर मुझे बचा सकता था। दिमाग धीरे-धीरे शून्य होने लगा।



ऐसे में मेरी विल पॉवर (Will Power)  काम में आई। मैंने तुरंत फैसला लिया कि अभी मुझे ही कुछ करना पड़ेगा लेकिन क्या, ये समझने में मैंने ज्यादा देर नहीं की। मुझे ये भी नहीं पता था कि मैं समंदर में कितनी गहराई पर हूं, लेकिन फैसला किया तलहटी में मरने से अच्छा है कुछ प्रयास करके मरना... और मैंने सीधा ऊपर की तरफ उठना शुरू कर दिया। 10 सेकंड में तेजी से ऊपर चढ़ते हुए सतह की तरफ बढ़ने लगा और जब ऊपर आया तो पेट के अंदर खारा पानी भर चुका था।

इंस्ट्रक्टर ने ऊपर पूछा कि क्या हुआ था। फोटो नहीं खिंच पाए हैं फिर से नीचे जाना पड़ेगा लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं बची थी। जल्दी से बोट पर आया और पेट से पानी निकाला। करीब आधा घंटे बाद दिमाग कुछ सोचने-समझने लायक हो पाया। खारे पानी ने सबसे पहले दिमाग पर ही अटैक किया था जिससे आपके निर्णय की क्षमता खत्म हो जाती है। समंदर में फोटो न खिंचने का मलाल रहा लेकिन ये भी सत्य था कि इसी समंदर में मेरी कब्र भी बन सकती थी। खैर कोई बात नहीं, उसके बाद आगे की यात्रा पर चल दिए...

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Wednesday, November 14, 2018

विधानसभा चुनाव 2018 में किस करवट बैठेगा जीत का 'ऊंट', पढ़ें ग्राउंड रियलिटी

मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना में किसकी बनेगी सरकार? नवंबर-दिसंबर 2018 में 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इन विधानसभा चुनावों में सरकार बनाने को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। पिछले 6 सालों में बाइक से 23,500 किमी की देशभर में यात्रा की जिनमें ये 4 राज्य भी शामिल हैं। यात्रा में दूर-दराज के इलाकों में भी जाना हुआ। उन्हीं अनुभवों के आधार पर ये बताने की कोशिश की जा रही है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में किसकी सरकार बन सकती है...

छत्तीसगढ़ में किसकी बन सकती है सरकार?

अगस्त 2018 में छत्तीसगढ़ के कवर्धा, रायपुर, महासमुंद, जशपुर, सरगुजा, कोरबा, बिलासपुर के इलाके से गुजरा। वहां कई लोगों से बात की, वहां की लाइफ स्टाइल को समझा और वहां के लोगों की मूल भावना तक पहुंचने की कोशिश की। चूंकि राजनीति को लेकर मेरा कोई एजेंडा नहीं था इसलिए जो भी समझा, मूल को समझा।
विधानसभा चुनाव 2018: छत्तीसगढ़ की बसना जगह पर बाइक खराब, यहां दिखा राजनीति पर लोकल नजरिया। 
उसके अनुसार, इस बार भी छत्तीसगढ़ में रमन सरकार बन रही है। इसका कारण भी है...बसना में एक जगह बाइक खराब हो गई तो वहां करीब 2 घंटे तक राजनीतिक बातें सुनी। मुस्लिम स्वाभाविक रूप से बदलाव चाह रहे हैं लेकिन बीजेपी और रमन सरकार समर्थक उनकी हर बात को विकास और सोशल इंजीनियरिंग की ग्राउंड रियलिटी बताकर चुप कर देते हैं। ये सच भी है क्योंकि इसका लाभ तो सभी तबकों को मिला है, इसलिए इससे कोई इनकार भी नहीं कर सकता। हां, इतना जरूर है कि कांग्रेस शासन में इनका जो दबदबा रहता था, वह नहीं है।
विधानसभा चुनाव 2018: छत्तीसगढ़ का जशपुरनगर, ये कभी नक्सली इलाका था लेकिन अब कहा जाता है कि यहां शांति है।
वहीं, जशपुर, सरगुजा से जब निकला तो वहां हर जगह रमन सरकार की योजनाओं की आड़ में पोस्टर लगे हैं। ये पोस्टर यहां की जनता को इमोशनली अटैच करते हैं। यहां की जनता को लगता है कि गरीबी के बावजूद यदि वह अपने इलाके में सम्मान के साथ रह रहे हैं तो उसके पीछे रमन सरकार है। इस वजह से वहां बदलाव की बात तो हो रही है लेकिन एंटीइनकंबेंसी इतनी मजबूत नहीं है कि वह सरकार को बदल दे। ग्रामीण इलाकों में जोगी कांग्रेस का फैक्टर भी दिखाई दिया लेकिन वह सब बाहुबली उम्मीदवारों के भरोसे है। उनका अपना प्रभाव लोकल लेवल पर है। वह नतीजों को बदल भी सकते हैं लेकिन इमोशनली अटैचमेंट के लेवल पर रमन सरकार के नजदीक ये नहीं पहुंच पा रहे। इतिहास गवाह रहा है चुनाव में तर्क पर हमेशा भावना भारी रही है और इस बार भी ये रमन सरकार के साथ नजर आती है।

मध्यप्रदेश में किसकी बन सकती है सरकार?

6 सालों में हर यात्रा भोपाल से शुरू हुई और वहीं खत्म। इस नाते मध्यप्रदेश के चंबल, मालवा, महाकोशल, बघेलखंड, मध्यभारत के क्षेत्रों से गुजरना हुआ। इन सबका चरित्र अलग-अलग और एक दूसरे से विपरीत है। इसलिए यहां के बारे में कोई भी बात करना थोड़ा टेढ़ी खीर है लेकिन फिर भी कोशिश करते हैं...
विधानसभा चुनाव 2018: मध्यप्रदेश में रायसेन जिला, बीजेपी के बारे में यहां के लोग कह रहे हैं कि वह दंभी हो गए हैं।
इस बार मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन रही है। इसका कारण है...मध्यप्रदेश में कांग्रेस हमेशा से ही मजबूत स्थिति में रही है। 2003 में जब कांग्रेस की सरकार थी तब कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि वह इतनी बुरी तरह से हारेगी लेकिन वह हारी और उसका कारण बना था दिग्विजय का वह दंभ कि सरकार तो मैनेजमेंट से जीती जाती है। नतीजा भयानक हार और ऐसी हार कि 15 साल बाद भी वह लड़ने की स्थिति में नहीं आ पाई। इस बार फिर से वही सीन है बस पार्टी चेंज है। इस बार बीजेपी को शुरू से ही लग रहा था कि सामने तो कोई विपक्षी दल है ही नहीं। इस वजह से उसने हर स्तर पर मनमानी की। जिसको चाहा उपकृत किया और जिसे चाहा उसे छोड़ दिया। ये ठीक उसी तरह के चिह्न थे जो 2003 में बने थे। कांग्रेस भी इस बार छिपकर अपनी तैयारी करती रही और बीजेपी के सामने ऐसे दिखाया जैसे सामने खाली मैदान हो। अंदर ही अंदर दिग्विजय सिंह नर्मदा यात्रा पूरी कर आए, ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्र में राहुल गांधी का भरोसा साथ लाए, कमलनाथ वित्तीय साधन के साथ मध्यप्रदेश के मैदान में उतरे और सुरेश पचौरी और अजय सिंह इनकी छाया में अपने क्षेत्र में ही सीमित कर दिए गए। अब बीजेपी का वास्ता एक ऐसी टीम से पड़ा है जो साम-दाम-दंड-भेद में सक्षम है और उसका असर भी दो महीनों में दिखना शुरू हो गया। वोटिंग के समय अभी कई छिपे हुए शस्त्र निकलेंगे और उन सबका एक ही उद्देश्य होगा कि मध्यप्रदेश में बीजेपी का खात्मा। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी पता है कि यदि वह जीत भी गए तो उनका मुख्यमंत्री पद जाना तय है इसलिए वह भी वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं। उधर, इस चुनाव में यदि शिवराज सरकार हारती है तो केंद्र में वनवास झेल रहे कैलाश विजयवर्गीय को भी ठंडक मिलेगी कि जिसके कारण वह निजी रूप से परेशान हुए, उसका फल उन्हें मिल गया। यहां की जनता का मानस भी बदलाव के पक्ष में है। ये बदलाव और तेज होता यदि शिवराज अहं भरी बातें कर देते लेकिन उनकी छवि समरसता की है इसलिए उतना पतन नहीं होगा, जितना कि 2003 में कांग्रेस का हुआ था।

अगले लेख में आप पढ़ेंगे राजस्थान और तेलंगाना के बारे में...


Friday, September 21, 2018

Life on Travel : भिखारी पॉलिटिक्स का गजबिया ज्ञान #4 #Amazingindia

Life on Travel : भिखारी पॉलिटिक्स का गजबिया ज्ञान #4 #Amazingindia: अभी हाल में बहुजन समाज पार्टी की लीडर मायावती  ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को धता बनाकर पूर्व कांग्रेसी लीडर अजीत ज...

भिखारी पॉलिटिक्स का गजबिया ज्ञान #4 #Amazingindia

अभी हाल में बहुजन समाज पार्टी की लीडर मायावती  ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी को धता बनाकर पूर्व कांग्रेसी लीडर अजीत जोगी की जनता कांग्रेस से गठबंधन कर लिया है। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि एक राष्ट्रीय पार्टी जब बीएसपी के दरवाजे पर दस्तक दे रही हो तब एक अनाम से क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन कुछ हजम नहीं होता, लेकिन ऐसा हुआ।

हाल ही में 6 राज्यों में 4500 किमी बाइक से छत्तीसगढ़ के दूर-दराज के क्षेत्रों में घूमकर जाना कि छत्तीसगढ़, कैसे दूसरे राज्यों से अलग है, वहां जमीनी स्तर पर लोग कैसे रहते हैं, इन सब सवालों के जवाब एक भिखारी के माध्यम से आर्टिकल में देने की कोशिश की गई है...


13 अगस्त 2018 शाम 6 से रात 7 बजे तक...छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाने वाला कवर्धा जिले में भोरमदेव टेंपल का रास्ता

भोपाल से 12 अगस्त को बाइक से निकला और 13 अगस्त की शाम को भोरमदेव टेंपल पहुंचा। भोरमदेव के मंदिर के चारों तरफ खजुराहो जैसी ही कामुक प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गईं हैं। यहां उस समय सावन का मेला चल रहा था। मंदिर को देखने के बाद जब रायपुर के लिए निकला तो अंधा भिखारी लिफ्ट लेने के लिए खड़ा था। मैं तो वैसे भी रास्ते में लिफ्ट देकर ही चलता हूं जिससे की लोकल के लोगों से बातचीत होती रहे। उसके साथ बेटी भी थी जो उसे रास्ता दिखाती थी। वह दोनों बाइक पर बैठ गए और शुरू हुई बातचीत..


इस भिखारी की बातें सुनकर पॉलिटिक्स के धुरंधरों की आखें खुल जाएंगी।
-कहां चलना है?
भिखारी-आगे 15 किमी की दूरी पर मेरा घर है, मुझे वहां तक छोड़ृ दें। मंदिर के प्रसाद के 8 किलो चावल मिले थे, उन्हें मैंने किसी और के हाथों घर भेज दिया है।
-यहां क्या रोज आते हो?
भिखारी-नहीं,बस सावन के महीने में 8 दिन मेला लगता है, उसी समय भीख के लिए आता हूं। यहां चावल चढ़ाया जाता है, उसी से काम चल जाता है?
-बाकी समय?
भिखारी-बाकी समय कुछ नहीं, बस घर पर पड़े रहते हैं।
-फिर घर कैसे चलता है?
भिखारी-रमन सिंह हर महीने चावल, कैरोसीन दे देता है। उससे घर चल जाता है।
-बाकी की जरूरतें कैसे पूरी होती हैं?
भिखारी-जब कुछ जरूरत होती है तो उनके घर चला जाता हूं। उनके बेटे अभिषेक से बात करता हूं तो कुछ मदद मिल जाती है।
-बच्चों की पढ़ाई?
भिखारी-स्कूल से ही कॉपी-किताब, ड्रेस मिलती हैं। स्कॉलरशिप भी मिलती है तो इससे काम चल जाता है। अब तो बस आवास चाहिए, उसका भी वादा किया हुआ है। अभी चुनाव आने वाले हैं, उनके घर जाकर फिर मिलता हूं। उनसे कहूंगा कि आवास दे दो तो इस बार भी तुम ही जीतोगे।
-अगर आवास नहीं दिया तो?
भिखारी-तो फिर कैसे जीतेगा, हमारे आशीर्वाद से ही तो उसे जीत मिलती है, हार नहीं जाएगा।
-वह तुम्हें आवास क्यों देगा?
भिखारी- क्योंकि उसका काम है देना।
-और तुम्हारा?
भिखारी-(इस बार जवाब देने से पहले वह कुछ देर रुका फिर बोला) हमारा काम है लेना....



(6 सालों में 23,500 किमी की दूरी तय कर 20 राज्यों में मोटरसाइकिल से भारत भ्रमण करने के बाद 'Amazingindia' सीरिज के तहत ये ऑरिजनल कंटेंट है। इसका किसी भी तरह से उपयोग करने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत कार्रवाई करने का सर्वाधिकार सुरक्षित)  

Saturday, September 15, 2018

आखिर क्यों नहीं पहनतीं यहां महिलाएं ब्लॉउज #3 #Amazingindia

भोपाल. 22 सितंबर को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओडिशा में एयरपोर्ट, रेल लाइन और माइनिंग से रिलेटेड इश्यूज के लिए ओडिशा जाने वाले हैं। ये एक ऐसा राज्य है जहां एक तरफ आधुनिकता के दर्शन होते हैं तो वहीं गरीबी के लिए भी ये दुनिया में बदनाम है। आखिर क्या है ओडिशा का सच? 
 

ओडिशा में चिल्का क्षेत्र की महिला बिना ब्लॉउज के सिर्फ साड़ी में ही। 
हाल ही में 6 राज्यों में 4500 किमी बाइक से ओडिशा के दूर-दराज के क्षेत्रों में घूमकर जाना कि ओडिशा, कैसे दूसरे राज्यों से अलग है, वहां जमीनी स्तर पर लोग कैसे रहते हैं, उनके लिए विदेश क्या है? आखिर वहां कई इलाकों की महिलाएं ब्लॉउज क्यों नहीं पहनतीं? इन सब सवालों के जवाब इस आर्टिकल में देने की कोशिश की गई है...

14 अगस्त 2018 रात 7 बजकर 50 मिनट से 17 अगस्त रात 9 बजे तक...ओडिशा में 1000 किमी की बाइक राइडिंग...यहां असका से हुम्मा के बीच की स्टोरी...हुम्मा से सिर्फ 6 किमी दूर ही पदमपेट में वर्ल्ड फेमस ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं का प्रजनन स्थल है

ओडिशा में पदमपुर कस्बे में प्रवेश करने के बाद एक चीज मुझे बार-बार चौंका रही थी। बरसात में यहां धान की खेती में महिलाएं काम कर रही थी लेकिन अपने शरीर को सिर्फ साड़ी से ही ढकें हुई थीं। पहले मैंने सोचा कि शायद ये कोई प्रथा होगी और कुछ विशेष इलाकों और बड़ी उम्र की महिलओं में ही ऐसा होता होगा लेकिन यहां तो ऐसा कुछ नहीं था। सभी उम्र की महिलाएं कई इलाकों में बिना ब्लॉउज के ही दिखीं।
असका से हुम्मा के बीच केे खेत। ओडिशा में मध्यप्रदेश से मेरी बाइक।

इस वजह से नहीं पहन पाती महिलाएं ब्लॉउज
असका से हुम्मा जाने के बीच एक जगह महिलाएं खेतों में काम कर रही थीं तो वहीं सड़क से गुजरते एक शख्स से आखिर पूछ ही लिया कि यहां ऐसा क्यों हैं? तब उसने जवाब दिया कि ये कोई प्रथा के कारण नहीं हैं। यहां गरीबी का बोल-बाला है। ये सभी महिलाएं सुबह 6 बजे से आईं है और दोपहर 12 बजे तक काम करेंगीं तब उन्हें 120 रुपए दिए जाएंगें। यदि पूरे दिन काम करेंगी तो 240 रुपए। साल के सिर्फ 2 महीने ही धान की खेती के समय इन्हें काम मिलता है, बाकी समय यहां कोई फसल नहीं होती। इसी पैसे से गुजारा करना पड़ता है। सदियों से ऐसा ही चल रहा है। अब जब पैसे ही नहीं होंगे तो वह कैसे कपड़ों पर खर्च करेंगी। यही कारण है कि एक साड़ी में ये पूरा जीवन गुजार देती हैं। बाकी के समय इन्हें 'विदेश' जाकर काम करना होता है? जब उनसे पूछा कि विदेश मतलब क्या तो उसने जवाब दिया कि आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र में जाकर काम करने को ही यहां विदेश माना जाता है।
साल में सिर्फ 2 महीने काम, मजदूरी सिर्फ 120 रुपए 
(6 सालों में 23,500 किमी की दूरी तय कर 20 राज्यों में मोटरसाइकिल से भारत भ्रमण करने के बाद 'Amazingindia' सीरिज के तहत ये ऑरिजनल कंटेंट है। इसका किसी भी तरह से उपयोग करने पर कॉपीराइट एक्ट के तहत कार्रवाई करने का सर्वाधिकार सुरक्षित)