Monday, August 5, 2019

Friendship With History: एक शाप से उजड़ गया था यह शानदार किला, तुगलकी फरमान का था गवाह

कहा जाता है कि देश की राजधानी दिल्ली 7 बार उजड़ी और बसी। हालांकि बताने वाले तो कहते हैं कि दिल्ली सात बार नहीं बल्कि 16 बार बसी और उजड़ी लेकिन इस बात के अभी तक प्रमाण नहीं हैं। खैर, कोई बात नहीं, हमने इस बार के फ्रेंडशिप डे को कुछ अलग तरह से मनाने की सोची और इस बार दोस्त बनाया अपने इतिहास को।




फेसबुक पर इवेंट पेज पर जानकारी लगी कि रविवार 4 अगस्त को 'सैर-ए-दिल्ली' पेज पर एक इवेंट की जानकारी है जिसमें तुगलकाबाद हेरिटेज वॉक की जानकारी दी गई थी। तुगलकों  के बारे में इतिहास में पढ़ रखा था कि इसी वंश के एक सुल्तान का नाम सनकी सुल्तान के रूप में इतिहास में  दर्ज है। यही एक चीज थी जिसने वहां जाने के लिए मजबूर कर दिया। 

हेरिटेज वॉक का समय सुबह 8 से 11 का था। खैर, सुबह साढ़े पांच उठे और सुबह 6.30 बजे की 34 ए नंबर की बस नोएडा सेक्टर 19 से पकड़ी। बस का 50 रुपये में पास बनवा लिया तो आराम से अब पूरे दिन दिल्ली में कहीं भी घूमने का इंतजाम हो गया। बस से पहुंचना तो 8 बजे तक था लेकिन सुबह खाली रास्तों को कारण सवा 7 बजे हम स्पॉट पर थे। अब वहां 25 रुपये का टिकट लिया और अन्य साथियों का इंतजार करने लगे। ठीक 8 बजे वहां फरीदाबाद, गुड़गांव और दिल्ली से आए करीब 50 साथी थे जो इस हेरिटेज वॉक का हिस्सा बनने वाले थे। 


किले के अंदर पहुंचकर सबका परिचय हुआ। इस किले के बारे में रोचक जानकारी देने के लिए यूसुफ भाई थे जो दिल्ली में बसे सातों शहरों की कई बार हेरिटेज वॉक करा चुके थे। इस किले और 14वीं शताब्दी में बसी तीसरी दिल्ली के बारे में उन्होंने तारीख ए फिरोजशाही और रिहाला किताब से जानकारी जुटाई थी। 

परिचय के बाद यूसुफ ने ट्रैकर्स को दिल्ली में बसे सातों शहरों के बारे में जमीन पर मैप बनाकर जानकारी देना शुरू की। तब पता चला कि हम जिस किले में खड़े थे, वह तीसरी बार बसी दिल्ली थी जिसे तुगलक वंश के ग्यासुद्दीन तुगलक ने 1320 से 1325 ईसवी के बीच बसाया था। इसने ही खिलजी वंश के बाद तुगलक वंश चलाया था। जब हमें कोई फरमान अजीब लगता है तो कहते हैं कि यह तुगलकी फरमान है। यह शब्द इसी तुगलक वंश की ईजाद है जिसे चरम पर ग्यासदुद्दीन तुगलक के बेटे मोहम्मद बिन तुगलक ने पहुंचाया।



आज के हमारे गाइड ने यहीं बताया कि ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक, सबसे पहली दिल्ली महरौली-लालकोट, दूसरी सीरी, तीसरी तुगलकाबाद, चौथी, जहांपनाह, पांचवी  फिरोजाबाद, छठवीं दीनपनाह और सातवीं शाहजहानांबाद है। जिसे हम पुरानी दिल्ली कहते हैं वह सबसे नई बसी हुई दिल्ली है। 


किले पर देखने लायक कई जगह थी जो इतिहास को हमारे सामने जीवंत कर रही थीं। एक शानदार बावली थी जिसमें सीढ़ियों से नीचे उतरने का रास्ता था। इस बावली के नीचे जो चट्टान नजर आ रही थी, वह अरावली पर्वतमाला का हिस्सा थी।


इसके बाद थोड़ा सा आगे चले तो एक घुमावदार दरवाजे के सामने सभी रुक गए। इस किले में प्रवेश करने के ऐसे 13 दरवाजे थे। इनका घुमावदार रास्ता इसलिए था कि दुश्मन के आक्रमण के समय सभी सचेत हो जाएं।

इसके आगे भी कुछ जगह थी जहां अन्न का भंडार करके रखा जाता था लेकिन वहां जाने का समय नहीं था। इसके बाद वहां सुल्तान के महल के भी भग्नावेष नजर आए जो एक समय दुनिया का श्रेष्ठ महल था। यह किला साढ़े 6 किलोमीटर में फैला था लेकिन अब 2 किलोमीटर का ही हिस्सा बचा हुआ है। 


किले में ही एक ऐसी जगह थी जो थोड़ा जमीन के नीचे थी और कई कोठरियां बनी थी। गाइड ने बताया कि यह शायद कैदियों को रखने की जगह या मीना बाजार था। इसमें चलना भी एक रोमांच की तरह था। 


किले में दूर तक नजर रखने के लिए चारों दिशाओं में चार वॉच टॉवर भी बनाए गए थे। इसके अलावा यहां एक और गहरी बावली नजर आई जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियां नहीं थीं। गाइड ने बताया कि इसे विजय मा जगह कहा जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि मौत की सजा पाए कैदियों को इसमें फेंक दिया जाता था। बावली में बड़े-बड़े मगरमच्छ थे जो नीचे फेंके गए कैदियों को खा जाते थे। 


इस किले से कुछ शाप भी जुड़े थे इसलिए उस समय का दुनिया का यह भव्यतम किला कुछ ही सालों में वीरान हो गया। इसके बारे में भी एक रोचक कहानी है। कहा जाता है कि ग्यासुद्दीन तुगलक ने किले को बनवाने के लिए दिल्ली की सारी जनता को मजदूर के रूप में लगा दिया। प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया ने उनके फरमान को मानने से इनकार किया तो सुल्तान ने उन्हें सजा देनी चाही। तब औलिया ने शाप दिया कि जिस किले का तुम्हें इतना घमंड है वह वीरान हो जाएगा। यह किला आधा उजड़ा और आधा गूजरों के कब्जे में चला जाएगा। 



निजामुद्दीन औलिया ने एक और शाप ग्यासुद्दीन तुगलक को दिया था। बंगाल विजय से लौटते समय सुल्तान ने अपने बेटे जौना खान को कहा कि मेरे दिल्ली आने से पहले निजामुद्दीन औलिया से कहो कि वह दिल्ली छोड़कर कहीं चले जाएं नहीं तो हम उसे छोड़ेंगे नहीं। तब औलिया साहब ने कहा कि अभी तो दिल्ली दूर है। उनकी बात सच साबित हुई। इलाहाबाद के पास कड़ा नाम की जगह पर जौना खां ने अपने पिता का सम्मान करने के लिए एक बड़ा शामियाना लगाया। जब उस पर हाथी चले तो वह ढह गया जिसमें ग्यासुद्दीन तुगलक की मौत हो गई। उसके बाद दिल्ली के तख्त पर मोहम्मद बिन तुगलक बैठा जिसने 1325 से 1351 ईसवी तक दिल्ली सल्तनत पर शासन किया।



किले के सामने दूसरे हिस्से में ही ग्यासुद्दीन तुगलक, उनकी पत्नी और उनके बेटे मोहम्मद बिन तुगलक की कब्र बनी हुई है। तुगलक वंश के ही फिरोजशाह तुगलक की कब्र हौज खास किले में बनी हुई है। 



यह सब देखने में 11 बजे चुके थे। अब वहां से निकले तो तुगलकाबाद गांव के रास्ते पर पहुंचे। यहीं 20 रुपये की शानदार बिरयानी और 20 रुपये की आलू टिक्की खाकर पेट पूजा की और फिर 34 नंबर की ही बस पकड़कर वापस अपने ठिकाने नोएडा सेक्टर 19 ए में 2 बजे तक लौटकर आए। 


इस तरह 200 रुपये हे्रिटेज वॉक का चार्ज, 25 रुपये का टिकट, 75 रुपये का खाना-पीना, 50 रुपये बस का किराया लगा। इस तरह 350 रुपये में सात में से एक दिल्ली को देखने का अनुभव लिया।  

Shyam Sundar Goyal
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Wednesday, July 17, 2019

Delhi-Rishikesh Bike Trip: वीक एंड पर एडवेंचर, महाभारतकालीन बस्ती के देखे प्रमाण

मोटरसाइकिल से 6 सालों में 23 हजार 500 किलोमीटर की देशभर में अकेले यात्रा करने का संकल्प पूरा करने के बाद अब कुछ छोटी यात्राओं की ओर मन लगाया। इस बार जगह भी बदली थी और संस्थान भी। हर बार मैं भोपाल से यात्रा शुरू करता था लेकिन इस बार यात्रा दिल्ली से शुरू की। यहां रहते हुए 8 महीने हो गए हैं। कार तो अपने साथ भोपाल से ले आया था लेकिन बाइक भोपाल में ही रखी रही। ऐसे में सबसे पहले बाइक की जुगाड़ की।


30 और 31 मई का ऑफिस में वीक ऑफ था। ऐसे में इन्हीं दो दिन में रिषिकेश की 600 किलोमीटर की यात्रा का प्लान बना डाला। मेरे ऑफिस के साथी ददन विश्वकर्मा के पास बजाज एवेंजर बाइक थी। 29 मई की रात 9 बजे मैंने उनसे बाइक मांगी तो उन्होंने सहर्ष हामी भर दी। फिर मैंने रूम में अपने एक साथी निखिल शर्मा से कहा कि मैं दो दिन के लिए बाइक से रिषिकेश जा रहा हूं, कमरे का ख्याल रखना। उसने दो मिनट सोचा और कहा कि मैं भी चलूंगा। वैसे तो मैं अभी तक बाइकिंग पर अकेले ही गया हूं लेकिन इस बार सोचा कि देखते हैं, साथी के साथ जाने का अनुभव क्या होता है। मैंने भी हां कह दी। सुबह 6 बजे निकलना तय हुआ। 

सुबह 6 बजे उठकर तैयार हुए और बाइक के लिए ददन भाई को फोन लगाया लेकिन फोन उठा नहीं। अब यह चिंता होने लगी कि न तो हमने उनका घर देखा है और न कॉन्टेक्ट हो पा रहा है। अब बाइक मिलेगी भी या नहीं। फिर सोचा कि अपनी कार से ही चलें लेकिन कमिटमेंट तो बाइकिंग का था न कि कार का। एटीएम में पैसा निकालने गया तो कार्ड ही ब्लॉक हो चुका था, नया कार्ड एक्टिवेट करने का समय नहीं था। ऐसे में निखिल ने पैसे दिए जो मैंने बाद में लौटाए। 6.30 बजे मोबाइल पर ददन भाई की कॉल आई कि मयूर विहार मेट्रो स्टेशन आ जाओ, वहीं बाइक के साथ मिलते हैं। तब जान में जान आई कि चलो अब तो बाइकिंग का इस साल का शगुन हो ही जाएगा।


सुबह साढ़े सात बजे मयूर विहार मेट्रो स्टेशन से रिषिकेश की यात्रा शुरू की। वैसे तो रिषिकेश का रास्ता गाजियाबाद, मेरठ होते हुए हाइवे से था लेकिन हर बार की तरह इस बार भी मैंने एक ऐेतिहासिक स्थल को इसमें शामिल किया और थोड़ा रूट बदला। दिल्ली से 48 किलोमीटर दूर बागपत पहुंचे और फिर यहां से 27 किलोमीटर आगे सादिकपुर सिनौली। सुबह के 10 बज चुके थे। वहीं, गांव में पहले सिनौली के बारे में जानकारी ली और खेतों के बीच बने घरों के पास पहुंचे। 

सादिकपुर सिनौली वह जगह है जहां के खेतों में खुदाई के दौरान एक युद्धस्थल निकला था। इसमें युद्ध में इस्तेमाल होने वाले रथ और तलवारों का जखीरा निकला था। कई कंकाल यहां मिले हैं। यहां निकले एक कंकाल के बारे में कहा जाता है कि वह महाभारतकाल की किसी राजकुमारी का कंकाल है। यहां से निकली सारी चीजों को अब लाल किले के संग्रहालय में पहुंचा दिया गया है।

बहरहाल, हमें वहां सिर्फ खेत दिखाई दिए। खुदाई का कहीं नामोनिशान नहीं था। हमें लगा कि हम कहीं गलत तो नहीं आ गए। ऐसे में वहां से गुजर रहे एक शख्स से खुदाई की जगह के बारे में पूछा तो उसने कहा कि सामने के खेत में ही खुदाई हुई थी लेकिन अब गरमी की वजह से खुदाई बंद है। तेज गर्मी से हम भी बेहाल थे तो हमने उनसे पानी मांगा। वह अपने घर ले गया और न सिर्फ पानी बल्कि गरमा गरम शुद्ध दूध की चाय दी और नाश्ता भी कराया। 

वह फिर हमें खुदाई की साइट पर ले गया। वहां अब खेती हो रही थी। इसी खेत में राजकुमारी का कंकाल निकला था। फिर वह हमें दूसरे खेत में ले गया जहां 2008 में खुदाई हुई थी और तलवार और रथ निकले थे। तब वह 10 साल का था और धुंधली-धुंधली यादों के सहारे बताया कि यहां शायद सोने की तलवार भी निकली थी। कई कंकाल भी निकले थे। 

वहां से हम लौटकर आए तो वह खाने की जिद करने लगा लेकिन हमें आगे निकलना भी था। सवा 11 बज चुके थे और अभी हम मंजिल से 200 किलोमीटर दूर थे। यह रास्ता भी कुछ ठीक और कुछ खराब था।


सिनौली से सवा 11 बजे निकलकर सवा 12 बजे 30 किलोमीटर दूर पुसार पहुंचे। वहां थोड़ी देर रुके और फिर 3 बजे 94 किलोमीटर की दूरी तय कर गुरुकुल नरसन पर महादेव ढाबा पर रुके जहां पेट-पूजा की। आराम से खाना खाने और फिर थोड़ा आराम कर फिर बाइक संभाली और 4 बजकर 10 मिनट पर यहां से रवानगी डाली।

अब हाइवे का रास्ता था इसलिए बाइक की स्पीड भी मैंटेन हो रही थी। सवा 5 बजे हम हरिद्वार में थे। अभी तक सुबह से 251 किमी बाइकिंग कर चुके थे। पहले सोचा कि यहां रुककर स्नान करते हैं और गंगा आरती देख आगे रिषिकेश जाते हैं। लेकिन ऐसा न करते हुए हम आगे बढ़ दिए।


अब रिषिकेश के रास्ते में हमें जाम मिलना शुरू हो गया। दो जगह भयानक जाम मिला लेकिन बाइक होने की वजह से आड़ी-टेड़ी लहराते हुए उसे निकाल ले गए और 1 घंटे में 24 किलोमीटर की दूरी तय कर आखिर रिषिकेश के त्रिवेणी घाट पहुंच गए।


अभी यहां आरती होने में आधा घंटा बाकी था। ऐसे में हम बैग वहीं एक आदमी की देखरेख में छोड़ पानी में उतर गए और जमकर ठंडे पानी में नहाकर थकान उतारी।   

आगे की कहानी जारी है....
Shyam Sundar Goyal
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Monday, April 8, 2019

दिल्ली-ऋषिकेश-दिल्ली के वह रोमांचपूर्ण 20 घंटे

ऋषिकेश जाने का मन तो दिल्ली में शिफ्ट होते ही कर रहा था लेकिन कभी भोपाल तो कभी ऑफिस के चक्कर में जाना नहीं हो पा रहा था। इस बार पक्का मन बना लिया था कि कैसे भी हो जाना ही है लेकिन फिर भोपाल से एक दोस्त आ गए छुट्टी के दिन। अब फिर से संकट कि उनके साथ समय गुजारें या फिर चले ऋषिकेश। जब दोस्त ने हामी भरी कि एक दिन रुक कर साथ चलेंगे तो हमने भी कहा ठीक है, कम से कम किसी का साथ तो हो जाएगा। हमने अपने वादे के अनुसार गुरुवार का दिन उनके साथ गुजार लिया लेकिन शुक्रवार को वह बोले कि यहां काम है, नहीं जा पाएंगे। अब हम फिर से संकट में अब आगे की छुट्टी भी चुनाव और घर के चक्कर में दांव पर हैं, जो करना है, अभी करना है। 

यही सोचकर 5 अप्रैल 2019 शुक्रवार को सुबह 11 बजे निकले ऋषिकेश जाने के लिए। 12 बजे कश्मीरी गेट बस अड्डे पहुंचे और वहां एक साधारण किराए की बस में बैठ गए। किराया था 286 रुपये। नाश्ता और खाना हुआ नहीं था, सोचा कि जहां बस रुकेगी, खा लेंगे। दोपहर 3 बजे बस खतौली पहुंची और वहीं 70 रुपये के पुलाव और 20 रुपये की फेमस शिकंजी पी। अब पेट को थोड़ी राहत मिली। इसके बाद बस ने तेजी पकड़ी और शाम साढ़े 5 बजे हरिद्वार पहुंच गए। एक मन किया कि यहीं उतरकर गंगा आरती देखी जाए तो दूसरे मन ने कहा कि ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर पहुंचकर वहां की गंगा आरती देखें। आखिर शाम 7 बजे पहुंच गए त्रिवेणी घाट।


वहां गंगा आरती अपने अंतिम चरणों में थी। अगले दिन से भारतीय नववर्ष भी शुरू हो रहा था इसलिए सजावट भी अच्छी थी। बस, वहीं बैठ गए गंगा में पैर डालकर और आंखे बंद कर लीं। गंगाजल का स्पर्श पाकर शरीर की थकान कहां उड़ गई, पता ही नहीं चला। इसके बाद वहीं 2 घंटे गुजारे। कभी इस घाट पर, तो कभी उस घाट पर। वहां कुछ बच्चे भी गंगा को पार कर दूसरी तरफ जा रहे थे और वहां से रेत भरकर इस तरफ ला रहे थे। इस रेत में नवरात्र के ज्वारे लगाने की परंपरा है। इस खतरनाक काम के एवज में बच्चे 20 रुपये ले रहे थे। 
फिर चाय की एक चुस्की लेकर चल दिए रामझूला की तरफ। समय रात के सवा नौ बजे। अब बाजार भी धीरे-धीरे बंद हो रहा था लेकिन अपने लिए तो यही सबसे अच्छा था। पास से ही एक ऑटो मिली जिसने 10 रुपये लेकर रामझूला के करीब उतार दिया। 

रात में रामझूला ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने रोशनी की लड़ी से गंगा का अभिषेक कर दिया हो। बाजार बंद हो चुके थे। रामझूला पर इक्का दुक्का लोग ही नजर आ रहे थे। जैसे ही पुल के बीच में पहुंचा तो ठंडी हवा के झोंके ने आत्मा को तृप्त कर दिया। लगा कि शायद इसी पल के लिए इतनी लंबी और यात्रा करके आया था। राम झूला का पार कर दूसरे किनारे पर पहुंचा। वहां कुछ लोग प्री वेडिंग शूट के लिए तैयारी कर रहे थे। अब यहां से एक तरीका तो यह था कि रामझूला से वापस जाकर बस से दिल्ली निकल लिया जाए या फिर दूसरे किनारे पर सुनसान इलाके में 2 किमी की पैदल यात्रा कर लक्ष्मण झूला जाया जाए। तब तक रात के 10 बज चुके थे।

अब पैदल ही लक्ष्मण झूला के लिए चल दिए। एक जगह तो बिल्कुल घुप्प अंधेरा था तो मोबाइल की रोशनी से रास्ते देखते हुए आगे बढ़ा। रास्ते में हर तरफ विदेशी युवा नजर आ रहे थे जो मोटर बाइक पर फर्राटे भरते हुए निकल रहे थे। जैसे ही लक्ष्मण झूला के नजदीक पहुंचे तो वहां इनकी संख्या तेजी से बढ़ गई। भारतीय तो वहां इक्के दुक्के ही नजर आ रहे थे, हर जगह विदेशी ही विदेशी युवा।


लक्ष्मण झूला पहुंचते-पहुंचते साढ़े 10 बज गए। वहां से लक्ष्मण झूला भी शानदार नजर आ रहा था। बीच पुल पर जाकर हवा के झोंको ने मन को प्रफुल्लित कर दिया। अब ऐसे ही दो चक्कर लक्ष्मण झूला के लगाए और फिर बीच में बैठ गए। वहां कई युवा इसी पल को जीने के लिए आए हुए थे। ऐसे ही 11 बज गए। अब ये फैसला करना था कि ऋषिकेश में रुककर सुबह जल्दी निकलें या फिर रात में ही निकल कर सुबह दिल्ली और 10 बजे ऑफिस पहुंचे। इसका फैसला समय पर ही छोड़ दिया और वहां से निकलकर पैदल दूसरी तरफ से राम झूला के लिए निकल दिए। इस समय तक सभी वाहन बंद हो चुके थे। अब जहां भी जाना था, पैदल ही जाना था।

आधा घंटे पैदल चलने के बाद एक बाइक सवार पास में आया और पूछा कि कहां जाना है, छोड़ देता हूं। मैंने कहा राम झूला तो उसने बैठा लिया। अब पहाड़ी क्षेत्र में बाइक का सफर तो अच्छा लगा। उसने राम झूले पर आकर छोड़ दिया। अभी झूले पर जाने से मन नहीं भरा था तो फिर एक बार रात को साढ़े 11 बजे राम झूले पर चहलकदमी करने निकल पड़े। अब यहां काफी सन्नाटा था लेकिन फिर भी इक्के-दुक्के लोग नजर आ रहे थे। थोड़ी देर चहलकदमी करने के बाद वापस दिल्ली आने के लिए सड़क पर आए तो यहां कोई वाहन ही नजर नहीं आया। बस स्टैंड भी करीब 5 किमी दूर था। ऐसे में फिर एक बाइक सवार को रोका तो उसने त्रिवेणी घाट के पास छोड़ दिया। मैं फिर से उसी जगह था जहां से यात्रा शुरू की थी लेकिन तब तक 5 घंटे गुजर चुके थे। अब त्रिवेणी घाट पर सिर्फ 3 लोग ही जागते मिले, बाकी घाटों पर सो रहे थे। मैंने भी नववर्ष की बेला पर गंगाजल लेकर नहाने जैसी रस्म अदायगी की और फिर दिल्ली वापस आने के लिए सड़क पर आ गया।

वहां चाय की एक दुकान खुली थी तो पीने की इच्छा हुई। उसी से बातों बातों में दिल्ली के लिए बस के बारे में पूछा तो उसने कहा कि रात 8 बजे से सुबह 8 बजे दिल्ली की सारी बसें यहीं से होकर जाती हैं। इतने में ही एक बस हरिद्वार के लिए आती हुई दिखी, वह लास्ट बस थी। मैनें भी चाय का मोह छोड़ा और बस में अंदर। रात 1 बजे हरिद्वार में दिल्ली जाने के लिए बस तैयार मिली। रात में बस काफी खाली थी इसलिए सीटों पर ही बैग का तकिया बनाया और कुछ सोकर और कुछ जागकर सफर पूरा किया। सुबह 7 बजे दिल्ली के कश्मीरी गेट पर बस पहुंच चुकी थी। मैं भी वहां से मेट्रो पकड़कर नोएडा पहुंचा और फिर तैयार होकर सुबह 10 बजे एक अच्छे कर्मचारी की तरह ऑफिस पहुंच गया। इस पूरी यात्रा में खर्च हुए 800 रुपये और 20 घंटे। 

Shyam Sundar Goyal
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Sunday, February 3, 2019

दिल्ली को क्यों कहते हैं दगाबाज शहर? महाभारत और पानीपत में छिपा है इसका राज

अक्सर दिल्ली के बारे में कहा जाता है कि यहां के लोगों में भावना नहीं है। कौन अपना है और कौन पराया, इसका भेद कभी किसी को नहीं लग पाता। भारत जैसे विशाल देश में जहां विभिन्नताओं की भरमार है, वहां की राजधानी में रहने वाले लोगों की सोच ऐसी क्यों है? क्या वह ऐसा करना चाहते हैं या इस दिल्ली की जमीन में ही ऐसा कुछ है कि यहां आकर लोग भी ऐसे हो जाते हैं। 



इस बारे में देश भर की यात्रा और विश्वास पाटील की किताब पानीपत पढ़कर ऐसा लगा कि सही मायने में दिल्ली को समझना है, तो इस किताब को पढ़ना पढ़ेगा, महाभारत के बारे में तो सब जानते ही हैं। इन सबको मिलाकर जो निष्कर्ष निकला, उसका निचोड़ है कि दिल्ली की जमीन ही ऐसी है जो अपनो को दगा करने पर मजबूर करती है। कैसे, आइये देखते हैं...

पानीपत किताब में एक प्रसंग आता है कि मराठा सेना, अहमदशाह अब्दाली से युद्ध करने 14 जनवरी 1761 से कई महीने पहले ही पानीपत के मैदान में डटी थी। अब्दाली ने दिल्ली से मराठों की कनेक्टिविटी काट दी थी, इसलिए उन्हें खाने और अन्य सुविधाओं के लिए स्थानीय लोगों पर निर्भर रहना पड़ता था। दिल्ली के लाल किले पर उस समय मराठों का ध्वज फहराता था, मुगल बादशाह सिर्फ नाम के बादशाह रह गए थे। 

ऐसे में एक दिन मराठों के पेशवा सदाशिवराव भाऊ पानीपत में अपनी रसद के लिए व्यवस्था कर रहे थे तो एक स्थानीय व्यक्ति से उलझ गए। उस व्यक्ति ने भाऊ को ललकारते हुए कहा कि तुम्हें किस चीज का गुमान है। जिस भूमि पर आप खड़े हो, वह दगाबाज जमीन है। इसने अपनों को कभी नहीं बख्शा है, और यह सच साबित हुआ। मराठों को स्थानीय स्तर पर कोई सहायता नहीं मिली। 14 जनवरी 1761 को मकर संक्राति के आधे दिन में ही मराठा साम्राज्य का सूरज सदा के लिए डूब गया। महाराष्ट्र में ऐसा कोई घर नहीं था, जिसका कोई सगा नहीं मरा था। 
यहीं हुआ था पानीपत का मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच 1761 में तीसरा युद्ध 
फिर मुझे लगा कि आखिर क्या है इस जमीन में क्या है जो यहां के साम्राज्य, पलों में बिखर जाते हैं और लोग अपनों से चोट खाते हैं। तब मैं थोड़ा समय के पीछे गया तो समझ में आया कि पानीपत, कुरुक्षेत्र, दिल्ली उस युद्ध भूमि के भाग थे जहां महाभारत का युद्ध् लड़ा गया था। कुरुक्षेत्र की मुख्य भूमि के आसपास 48 कोस यानि 156 किलोमीटर के दायरे में ये युद्ध हुआ था जिसमें दिल्ली भी आती है। दिल्ली की कुरुक्षेत्र से दूरी 155 किलोमीटर है। 18 दिनों में यह श्मशान भूमि बन गई थी। 

इसी वृक्ष के नीचे कृष्ण ने दिया था अर्जुन को गीता का ज्ञान, बोर्ड पर लिखा है कि महाभारत का युद्ध ़156 किलोमीटर तक हुआ था। 
तब भी भारत का कोई भी भाग ऐसा नहीं था, जब किसी घर में मौत नहीं हुई थी। यहां भी हस्तिनापुर के कौरवों के शक्तिशाली साम्राज्य को, पांडवों के हाथों खोना पड़ा था। अपनों ने ही अपनों से दगा का इतिहास यहां पर लिखा था। शायद तब से अब तक यही कहानी चली आ रही है। जो सबसे शक्तिशाली होता है, वही यहां धराशायी होता है। यह आज भी हो रहा है। हर रोज यहां लोग कहते हैं कि हमने उस पर भरोसा किया लेकिन उसने दगा किया। यहां तक कि बाहर से भी जो लोग यहां आते हैं, उनका व्यवहार भी यहीं के जैसा हो जाता है। 

महाभारत के युद्ध के बाद दिल्ली कई सालों तक राजधानी नहीं बनी। भारत का शासन मगध के पाटिलिपुत्र से चलता रहा। हर्षवर्धन के समय कन्नौज भारत की राजधानी रही। उसके बाद परमार और प्रतिहार काल में भी कन्नौज ही सत्ता का केंद्र था। दिल्ली को कई सालों बाद राजधानी का दर्जा दिया पृथ्वीराज चौहान ने। उसने अजमेर और दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। 1192 ईसवी में उसे मोहम्मद गौरी के हाथों बुरी तरह पराजय मिली और दगा किया उनके अपने ही भारतवासी कन्नौज के महाराज जयचंद ने।

उसके बाद दिल्ली में कई सल्तनतें एक झटके में खत्म हुईं और बनी। पानीपत का पहला युद्ध् बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच 1526 में हुआ। एक ही दिन में लोदी वंश का साम्राज्य खत्म हो गया और बाबर को जीत मिली। बाबर को भारत में आमंत्रण राणा सांगा ने दिया था। 

उसके बाद पानीपत का दूसरा युद्ध् 1556 में हुआ। उस समय दिल्ली पर हेमू का शासन था। 13 साल के अकबर ने हेमू को आसानी से हरा दिया। पानीपत का तीसरा युद्ध मराठों और अहमदशाह अब्दाली के बीच 1761 में हुआ। इसमें भी सिर्फ एक दिन में इतिहास बदल गया। उसके बाद पानीपत में कोई युद्ध नहीं हुआ और न ही दिल्ली को फिर वैसा वैभव मिला। 

उसके बाद कलकत्ता से अंग्रेजों का शासन शुरू हो गया था। अंग्रेजों ने भी जब दिल्ली को 1911 में राजधानी बनाया तो यहां क्रांतियों का दौर शुरू हुआ। 15 अगस्त 1947 को एक दिन में ही अंग्रेजों का सूर्य अस्त हुआ और भारतीयों को सत्ता मिली। आज भी दिल्ली की वही तासीर है। इंदिरा गांधी का तब तख्ता पलटा, जब वह सबसे ताकतवर थीं। एनडीए की वाजपेयी सरकार केंद्र में तब हारी, जब वह सबसे मजबूत थी और वह भी अपनों की वजह से। यही हाल दिल्ली की सत्ता का रहा जहां एक नई नवेली आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का सूर्य ही अस्त कर दिया। अभी और भी बहुत कुछ देखना है दिल्ली को... 

अब हम भी इसी दिल्ली शहर में
तो दिल्ली में रहना है तो दिल्ली की तासीर को समझना होगा। क्योंकि यही दिल्ली है जो पूरे विश्व में लोगों को ख्याति दिलाती है, राजा को रंक और रंक को राजा बनाती है। फर्श से अर्श तक उठाने की ताकत भी दिल्ली में है और शासन का नैसर्गिक गुण तो दिल्ली में है ही। दिल्ली में रहने का मूलमंत्र है कि किसी पर विश्वास न करो, दगा झेलने को तैयार रहो और उसे सफलता की सीढ़ी बनाकर ऊंचाईयों को छुओ...क्योंकि भाई दिल्ली ऐसी ही है...

Shyam Sundar Goyal
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Tuesday, January 15, 2019

महेंद्र सिंह #Dhoni को जब पब्लिक के पत्थरों से बचने के लिए बदलना पड़ा था घर

आज हर जगह क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की चर्चा हो रही है कि उसने क्रिकेट के खेल में जबरदस्त वापसी की है. हो भी क्यों नहीं, धोनी है ही ऐसी शख्सियत...अपनी बिहार-बंगाल की यात्रा के दौरान मुझे उसी रांची में जाने का मौका मिला जहां महेंद्र सिंह धोनी का घर है.

महेंद्र सिंह धोनी का रांची में रिंग रोड वाला 7 एकड़ में फैला आलीशान घर (Photo:Life on Travel)
छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार में बाइकिंग करने के बाद 21 अगस्त 2018 की रात 12 बजे रांची पहुंचा. वहां अपने एक साथी ओमप्रकाश सिंह के यहां रुका जो दैनिक भास्कर डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं और बिहार और झारखंड की खबरों पर पैनी निगाह रखते हैं. रात को भूखा ही सोना पड़ा क्योंकि तब तक वहां के सारे होटल बंद हो चुके थे.

रात को ही प्लान ही बना कि सुबह धोनी का घर देखने जाना है. उस समय रांची मेरे लिए सिर्फ इतना ही था. इसके लिए रात में भास्कर के सीनियर स्पोर्टस रिपोर्टर नईम जी को फोन लगाया जो धोनी की हर खबर रखते हैं लेकिन उनसे उस समय बात नहीं हो सकी. खेर कोई बात नहीं, सोचा सुबह चलकर वहीं से फोन लगा लेंगे.

सुबह 6 बजे सोकर हम दोनों उठ गए. सबसे पहले धोनी के पुराने हरमू रोड के घर पहुंचे जो अब खाली पड़ा है. वहां कोई नहीं रहता. धोनी यहां से करीब 12 किमी दूर एक फॉर्म हाउस पर आलीशान घर बनाकर रहते हैं. जब मैंने अपने साथी से पूछा कि शहर के बीच में ये घर खाली कर क्यों चले गए तो उसने जवाब दिया कि जब भी धोनी कोई मैच हारते थे पूरे शहर की पब्लिक इस घर पर पत्थर फेंकने लगती थी. फैन्स भी यहां पर काफी तादाद में आते थे.
महेंद्र सिंह धोनी का रांची में हरमू रोड वाला पुराना घर (Photo:Life on Travel)
उस घर को देखने के बाद अब धोनी के नए ठिकाने की तलाश की. रांची में रिंग रोड में धोनी का ये फार्म हाउस करीब 7 एकड़ में फैला हुआ है. लोगों से पूछ-पूछकर शहर के बाहर हाइवे पर पहुंचे. वहां देखा कि बिल्कुल सुनसान जगह पर घर बनाया है. अब यहां से कोई पत्थर कितनी ताकत से भी फेंक ले, घर के अंदर नहीं जा सकता.
हम जब वहां पहुंचे तो धोनी अंदर ही थे. वहां से हमने नईम जी को फोन लगाया कि शायद मुलाकात करवा दें लेकिन उस समय ऐसा न हो पाया. गार्ड को भी कन्वेंस करने की कोशिश की भाई इतनी दूर से उसी स्पोर्टस बाइक से यात्रा करके आए हैं जिसका तुम्हारे साहब ने कई सालों तक प्रचार किया है. लेकिन गार्ड तो गार्ड है, उसने कहा कि साहब किसी से नहीं मिलेंगे. वह अभी सोकर उठे हैं.

महेंद्र सिंह धोनी का रांची में रिंग रोड वाला 7 एकड़ में फैला आलीशान घर (Photo:Life on Travel)
अब अपने पास इतना समय तो था नहीं कि पूरे दिन फैन के रूप में इंतजार करते. वैसे भी क्रिकेट में कोई ज्यादा इंटरेस्ट तो था नहीं. वह तो महेंद्र सिंह धोनी फिल्म देखी, उसमें लाइफ के इतने उतार चढ़ाव देखे कि सहज ही उनसे मिलने का मन हुआ. नहीं तो, पूरे देश के भ्रमण में मैंने किसी वीआईपी से मिलने का प्लान ही नहीं बनाया. नहीं तो आधा समय तो इसी की प्लानिंग में निकल जाता. अपने लिए तो आम लोग ही वीआईपी थे जो सहज भाव से अपनेपन से मिल तो लेते हैं.

खैर, उसके बाद वहां से 1 घंटे बाद वापिस हो लिए और अगली मंजिल के लिए निकल दिए. ठीक 10 बजे रांची शहर को नमस्ते कर आगे की राह चल दिए.



Sunday, January 6, 2019

स्कूबा डाइविंग में ऑक्सीजन खत्म, 10 सेकंड में होने वाली थी मौत लेकिन...

6 सालों में भारत (Solo India Trip on Bike) के 20 राज्यों में 23,500 किलोमीटर की बाइक से यात्रा के दौरान कुछ ऐसे पल भी आए जब सीधे मौत ने दस्तक दे दी। कुछ ही सेकंड ही आप मरने वाले हों और फिर उस स्थिति से बाहर आना। ऐसी ही एक घटना 28 मार्च 2017 को महाराष्ट्र के मालवण तट पर स्कूबा डाइविंग के दौरान घटी जिसके पास समुद्री सिंधुदुर्ग किला है।

प्रतीकात्मक फोटो
ये सफर नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए
आग का दरिया है और तैर कर पार करना है...

कुछ इसी तरह के अनुभव भारत यात्रा (Journey of India) में हुए हैं। आज मैं आपको बताने जा रहा हूं 28 मार्च 2017 की उस घटना के बारे में जब मैं साउथ इंडिया (Journey of South India) की 7214 किमी की यात्रा पर था।गोवा (Journey of Goa) से लौटते हुए समुद्री किले सिंधुदुर्ग को देखने की इच्छा हुई। सिंधुदुर्ग किला (Sindhudurg Fort)  महाराष्ट्र के मालवण तट पर है। मालवण से वहां जाने लिए स्टीमर चलते हैं।


मैं मालवण गया तो था किला देखने लेकिन वहां जब देखा कि 800 रुपए में स्कूबा डाइविंग हो रही है तो मैंने पहले स्कूबा डाइविंग (5 best places to go scuba diving in India) की सोची, उसके बाद किला घूमने की। अपनी बाइक (Bike Trip)  वहीं किनारे खड़े की और काउंटर पर जाकर 800 रुपए की रसीद कटाई। उस स्टीमर पर और भी लोग सवार थे जो स्कूबा डाइविंग के लिए ही बैठे थे।



मेरे समुद्र में उतरने से पहले तीन लोग स्कूबा डाइविंग करके आ चुके थे। उनके समंदर की तलहटी में रंगीन मछलियों और चट्टानों के साथ बेहतरीन फोटो आए थे। समंदर के अंदर वीडियो और फोटोग्राफी टिकट में ही शामिल थी।

मेरा भी नंबर आया तो कमर में लोहे का भारी बेल्ट बांध दिया गया। पीठ पर ऑक्सीजन सिलेंडर और नाक को मास्क से पैक कर दिया गया। अब सिर्फ मुंह से सांस लेनी और छोड़नी थी। मुझे तैरना नहीं आता था लेकिन स्कूबा डाइविंग में ये कोई बाधा नहीं थी। 5 मिनट की प्रैक्टिस के बाद पहली बार गहरे समंदर में उतर गया। मैंने स्टीमर के पास ही गोता लगा लिया और पानी के नीचे गोता लगाने लगा।

\महाराष्ट्र के मालवण में सिंधुदुर्ग समुद्री किले के पास स्कूबा डाइविंग Scuba diving.
पहले तो सामने धुंधला पानी दिखा लेकिन जैसे ही तलहटी पर पहुंचा तो दुनिया ही बदल गई। आसपास ढेर सारी रंगीन मछलियां और साफ पानी। ऐसा लगा कि स्वर्ग में आ गए। सामने इंस्ट्रक्टर फोटो खींचने के लिए कैमरा सेट करने लगा। मैं भी एक समुद्री चट्टान पकड़कर इस बेहतरीन पल को एन्जॉय कर रहा था कि अचानक सबकुछ बदलने लगा।

मुझे अचानक लगा कि जैसे ऑक्सीजन खत्म हो गई। सांस लेने में तकलीफ होने लगी। ऊपर से समंदर के पानी का प्रेशर। मुझे लगा कि शायद मुंह से आक्सीजन की नॉब निकल गई है। मैंने उसे बाहर निकालकर फिर से आक्सीजन अंदर खींची तो समंदर का नमकीन पानी फुल प्रेशर से मुंह के अंदर घुस गया और सीधा दिमाग पर अटैक करने लगा। कानों के अंदर ऐसा लगने लगा जैसे वे फट जाएंगे।

फिर नॉब बाहर निकाली और सांस खींची, तब भी वही स्थिति। सिर्फ 5 सेकंड में ऐसा लगा कि कुछ ही सेकंड में मौत होने वाली है। सामने मेरे इंस्ट्रक्टर थे लेकिन उसे कुछ कह नहीं पा रहा था और न ही उस समय वह इशारा याद आ रहा था जो खतरे के समय करने से इंस्ट्रक्टर मुझे बचा सकता था। दिमाग धीरे-धीरे शून्य होने लगा।



ऐसे में मेरी विल पॉवर (Will Power)  काम में आई। मैंने तुरंत फैसला लिया कि अभी मुझे ही कुछ करना पड़ेगा लेकिन क्या, ये समझने में मैंने ज्यादा देर नहीं की। मुझे ये भी नहीं पता था कि मैं समंदर में कितनी गहराई पर हूं, लेकिन फैसला किया तलहटी में मरने से अच्छा है कुछ प्रयास करके मरना... और मैंने सीधा ऊपर की तरफ उठना शुरू कर दिया। 10 सेकंड में तेजी से ऊपर चढ़ते हुए सतह की तरफ बढ़ने लगा और जब ऊपर आया तो पेट के अंदर खारा पानी भर चुका था।

इंस्ट्रक्टर ने ऊपर पूछा कि क्या हुआ था। फोटो नहीं खिंच पाए हैं फिर से नीचे जाना पड़ेगा लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं बची थी। जल्दी से बोट पर आया और पेट से पानी निकाला। करीब आधा घंटे बाद दिमाग कुछ सोचने-समझने लायक हो पाया। खारे पानी ने सबसे पहले दिमाग पर ही अटैक किया था जिससे आपके निर्णय की क्षमता खत्म हो जाती है। समंदर में फोटो न खिंचने का मलाल रहा लेकिन ये भी सत्य था कि इसी समंदर में मेरी कब्र भी बन सकती थी। खैर कोई बात नहीं, उसके बाद आगे की यात्रा पर चल दिए...

(Mobile No.-9827319747...Mail ID-ss.goyal78@gmail.com...Facebook Page-Shyam Sundar Goyal...Twitter-@ssgoyalat...Instagram-shyam_s_goyal )

Wednesday, November 14, 2018

विधानसभा चुनाव 2018 में किस करवट बैठेगा जीत का 'ऊंट', पढ़ें ग्राउंड रियलिटी

मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना में किसकी बनेगी सरकार? नवंबर-दिसंबर 2018 में 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इन विधानसभा चुनावों में सरकार बनाने को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। पिछले 6 सालों में बाइक से 23,500 किमी की देशभर में यात्रा की जिनमें ये 4 राज्य भी शामिल हैं। यात्रा में दूर-दराज के इलाकों में भी जाना हुआ। उन्हीं अनुभवों के आधार पर ये बताने की कोशिश की जा रही है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में किसकी सरकार बन सकती है...

छत्तीसगढ़ में किसकी बन सकती है सरकार?

अगस्त 2018 में छत्तीसगढ़ के कवर्धा, रायपुर, महासमुंद, जशपुर, सरगुजा, कोरबा, बिलासपुर के इलाके से गुजरा। वहां कई लोगों से बात की, वहां की लाइफ स्टाइल को समझा और वहां के लोगों की मूल भावना तक पहुंचने की कोशिश की। चूंकि राजनीति को लेकर मेरा कोई एजेंडा नहीं था इसलिए जो भी समझा, मूल को समझा।
विधानसभा चुनाव 2018: छत्तीसगढ़ की बसना जगह पर बाइक खराब, यहां दिखा राजनीति पर लोकल नजरिया। 
उसके अनुसार, इस बार भी छत्तीसगढ़ में रमन सरकार बन रही है। इसका कारण भी है...बसना में एक जगह बाइक खराब हो गई तो वहां करीब 2 घंटे तक राजनीतिक बातें सुनी। मुस्लिम स्वाभाविक रूप से बदलाव चाह रहे हैं लेकिन बीजेपी और रमन सरकार समर्थक उनकी हर बात को विकास और सोशल इंजीनियरिंग की ग्राउंड रियलिटी बताकर चुप कर देते हैं। ये सच भी है क्योंकि इसका लाभ तो सभी तबकों को मिला है, इसलिए इससे कोई इनकार भी नहीं कर सकता। हां, इतना जरूर है कि कांग्रेस शासन में इनका जो दबदबा रहता था, वह नहीं है।
विधानसभा चुनाव 2018: छत्तीसगढ़ का जशपुरनगर, ये कभी नक्सली इलाका था लेकिन अब कहा जाता है कि यहां शांति है।
वहीं, जशपुर, सरगुजा से जब निकला तो वहां हर जगह रमन सरकार की योजनाओं की आड़ में पोस्टर लगे हैं। ये पोस्टर यहां की जनता को इमोशनली अटैच करते हैं। यहां की जनता को लगता है कि गरीबी के बावजूद यदि वह अपने इलाके में सम्मान के साथ रह रहे हैं तो उसके पीछे रमन सरकार है। इस वजह से वहां बदलाव की बात तो हो रही है लेकिन एंटीइनकंबेंसी इतनी मजबूत नहीं है कि वह सरकार को बदल दे। ग्रामीण इलाकों में जोगी कांग्रेस का फैक्टर भी दिखाई दिया लेकिन वह सब बाहुबली उम्मीदवारों के भरोसे है। उनका अपना प्रभाव लोकल लेवल पर है। वह नतीजों को बदल भी सकते हैं लेकिन इमोशनली अटैचमेंट के लेवल पर रमन सरकार के नजदीक ये नहीं पहुंच पा रहे। इतिहास गवाह रहा है चुनाव में तर्क पर हमेशा भावना भारी रही है और इस बार भी ये रमन सरकार के साथ नजर आती है।

मध्यप्रदेश में किसकी बन सकती है सरकार?

6 सालों में हर यात्रा भोपाल से शुरू हुई और वहीं खत्म। इस नाते मध्यप्रदेश के चंबल, मालवा, महाकोशल, बघेलखंड, मध्यभारत के क्षेत्रों से गुजरना हुआ। इन सबका चरित्र अलग-अलग और एक दूसरे से विपरीत है। इसलिए यहां के बारे में कोई भी बात करना थोड़ा टेढ़ी खीर है लेकिन फिर भी कोशिश करते हैं...
विधानसभा चुनाव 2018: मध्यप्रदेश में रायसेन जिला, बीजेपी के बारे में यहां के लोग कह रहे हैं कि वह दंभी हो गए हैं।
इस बार मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन रही है। इसका कारण है...मध्यप्रदेश में कांग्रेस हमेशा से ही मजबूत स्थिति में रही है। 2003 में जब कांग्रेस की सरकार थी तब कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि वह इतनी बुरी तरह से हारेगी लेकिन वह हारी और उसका कारण बना था दिग्विजय का वह दंभ कि सरकार तो मैनेजमेंट से जीती जाती है। नतीजा भयानक हार और ऐसी हार कि 15 साल बाद भी वह लड़ने की स्थिति में नहीं आ पाई। इस बार फिर से वही सीन है बस पार्टी चेंज है। इस बार बीजेपी को शुरू से ही लग रहा था कि सामने तो कोई विपक्षी दल है ही नहीं। इस वजह से उसने हर स्तर पर मनमानी की। जिसको चाहा उपकृत किया और जिसे चाहा उसे छोड़ दिया। ये ठीक उसी तरह के चिह्न थे जो 2003 में बने थे। कांग्रेस भी इस बार छिपकर अपनी तैयारी करती रही और बीजेपी के सामने ऐसे दिखाया जैसे सामने खाली मैदान हो। अंदर ही अंदर दिग्विजय सिंह नर्मदा यात्रा पूरी कर आए, ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्र में राहुल गांधी का भरोसा साथ लाए, कमलनाथ वित्तीय साधन के साथ मध्यप्रदेश के मैदान में उतरे और सुरेश पचौरी और अजय सिंह इनकी छाया में अपने क्षेत्र में ही सीमित कर दिए गए। अब बीजेपी का वास्ता एक ऐसी टीम से पड़ा है जो साम-दाम-दंड-भेद में सक्षम है और उसका असर भी दो महीनों में दिखना शुरू हो गया। वोटिंग के समय अभी कई छिपे हुए शस्त्र निकलेंगे और उन सबका एक ही उद्देश्य होगा कि मध्यप्रदेश में बीजेपी का खात्मा। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी पता है कि यदि वह जीत भी गए तो उनका मुख्यमंत्री पद जाना तय है इसलिए वह भी वेट एंड वॉच की स्थिति में हैं। उधर, इस चुनाव में यदि शिवराज सरकार हारती है तो केंद्र में वनवास झेल रहे कैलाश विजयवर्गीय को भी ठंडक मिलेगी कि जिसके कारण वह निजी रूप से परेशान हुए, उसका फल उन्हें मिल गया। यहां की जनता का मानस भी बदलाव के पक्ष में है। ये बदलाव और तेज होता यदि शिवराज अहं भरी बातें कर देते लेकिन उनकी छवि समरसता की है इसलिए उतना पतन नहीं होगा, जितना कि 2003 में कांग्रेस का हुआ था।

अगले लेख में आप पढ़ेंगे राजस्थान और तेलंगाना के बारे में...